बहुत महंगा पड़ने वाला है दुनिया को ट्रंप का ट्रेड वार, मजबूती के साथ रखनी होगी भारत को अपनी बात।

“डोनाल्ड ट्रंप का टैरीफ वार”

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टेरीफ घोषणाओं के कारण ट्रेड वॉर की आशंकाओं के बीच सोमवार सुबह भारत सहित दुनिया भर के शेयर बाजार में भारी उतार-चढ़ाव दिखा। कई देशों के शेयर बाजार धडाम हो गए। यूरोप तथा एशिया के शेयर बाजार में काफी नुकसान हुआ है। एक तरह के आर्थिक युद्ध का माहौल दुनियाँ मे नज़र आने लगा है। आर्थिक फंडा (ब्लॉग ) कि आज की पोस्ट में हम इसी अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर चर्चा करने वाले है। आज किस आर्टिकल को हम निम्न बिंदुओं के तहत रीढ़ करेंगे।

टेबल ऑफ़ कंटेंट / आज की पोस्ट में

  1. इंट्रोडक्शन। ट्रेड वॉर की शुरुआत।
  2. ट्रंप के ट्रेड वॉर के साइड इफेक्ट क्या होंगे।
  3. किस देश पर कितना टैरिफ
  4. मंदी की आहट शुरू
  5. एलपीजी गैस और पेट्रोल महंगा
  6. क्या कदम उठाने चाहिए भारत को।
  7. नया टैरिफ भारत के लिए चुनौती भी, तो अवसर भी।
  8. अगर दुनिया के देश एकजुट हुए तो अमेरिका को नुकसान संभव
  9. ट्रंप के टैरिफ वार के उद्देश्य क्या है।
  10. क्या कदम उठाएगा भारत
  11. निष्कर्ष।

क्या दुनिया के देश ट्रंप के टैरिफ युद्ध के विरुद्ध एकजुट होकर लड़ेंगे..? विश्लेषकों की दलील तो यही है कि ट्रंप की दोस्त के आगे झुकने के बजाय दुनिया को उनसे लड़ने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाना चाहिए। उनका मत है कि ट्रंप के दबाव में आना समस्या का समाधान नहीं है। पंप को तो यह देखना अच्छा ही लगेगा कि दुनिया के नेता उन्हें खुश करने के लिए उनके घुटनों पर गिरे। तब वह धमकाने के दूसरे दूसरे तरीके खोजने लगेंगे। लेकिन यह देखना वाकई शानदार होगा कि दुनिया के बाकी देश मिलकर जवाबी कार्रवाई करें अमेरिका के चारों ओर टैरिफ की दीवार बनाएं और दुनिया की इस महाशक्ति को वैश्विक रूप से बहिष्कृत कर दें इससे अमेरिका के बाहर वैश्विक कारोबार बढ़ेगा।

साथ यह उन तमाम राजनेताओं के लिए भी एक जरूरी सबक होगा जो विश्व व्यापार व्यवस्था को कुचलना की आशंका रखते हैं और जो अपने बेटू के सिद्धांतों को अमल में लाने के लिए दुनिया को मंदी में झाेकने से भी नहीं कतराते। यूं तो अमेरिका के बाहर की दुनिया बहुत बड़ी है लेकिन क्या यूरोप ट्रंप का मुकाबला करने के लिए एशियाई देशों के साथ हाथ मिला सकता है..? या यूरोप ट्रंप को सबक सिखाने के लिए अमेरिका के दो संकटग्रस्त पड़ोसियों मेक्सिको और कनाडा का साथ देगा..? या फिर यूरोपीय संघ के 27 अमीर देश आखिरकार अपनी नींद से जागेंगे और अमेरिका के साथ ट्रेड वॉर में शामिल होंगे..? लेकिन अफसोस की बात है कि ऐसा नहीं होने वाला हाल फिलहाल तो ऐसी संभावना नजर नहीं आती। पिछले हफ्ते ट्रंप द्वारा अपने आयात पर 20% टैरिफ की घोषणा करने के बाद आई यू ने सबसे पहले अमेरिका के खिलाफ जवाई अभी कार्रवाई करने के बजाय इस पर विचार किया कि चीन को यूरोप में अपना माल डंप करने से कैसे रोके। नतीजा तन ब्राज़ील ने चीनी टीवी पर 35% टैरिफ लगा दिया और वह दूसरे चीनी उत्पादों पर भी बहुत अधिक टैरिफ लगाने पर विचार कर रहा है। चीन पर ट्रंप के टैरिफ की बौछार ने यूरोप को भी चीनी माल पर टैरिफ लगाने के लिए प्रेरित किया है यानी ट्रंप का सामना करने के बजाय यूरोप में उलटे चीन के साथ ट्रेड बार छेड़ दिया है। जब बात अमेरिका की आती है तो यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के बीच जवाबी कार्रवाई के लिए आम सहमति नहीं बन पाती। फ्रांस जर्मनी स्पेन और बेल्जियम ए सी आई का उपयोग करने के पक्ष में हैं। लेकिन अन्य देश विशेष रूप से इटली रोमानिया ग्रीस और हंगरी इसके खिलाफ हैं। वे अमेरिका से बातचीत करना पसंद करते हैं। यूरोपीय संघ की नौकरशाही के भीतर नीति निर्माण की गति इतनी धीमी है कि अगर कोई आम सहमति बन जाती है तो भी यूरोपीय संघ ट्रंप के टैरिफ युद्ध का मुकाबला नहीं कर पाएगा। लेकिन कम से कम इस तरह की कार्रवाई ट्रंप को अपने तेरे फोन पर पुनर्विचार करने के लिए जरूर मजबूर कर सकती है। 2023 में यूरोपीय संघ और अमेरिका के बीच 818 अरब डॉलर का सर्विसेज ट्रेड था, जिसमें अमेरिका का ट्रेड सरप्लस 119 अरब डॉलर का था।

लेकिन एशियाई देशों के बारे में क्या..? परचेसिंग पावर के आधार पर दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। उसने अमेरिकी माल पर 35 परसेंट टैरिफ लगाकर जवाबी कार्रवाई की है लेकिन क्या एशियाई देश ट्रेड वॉर लड़ने के लिए चीन का साथ देंगे..? जापान दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया तो एशिया में चीन के प्रभाव को नियंत्रित रखने के लिए मिशन में अमेरिका के साझेदार रहे हैं। विक्रम को विश्व व्यापार व्यवस्था को नष्ट करने से रोकने के लिए चीन का साथ कैसे दे सकते हैं..? और क्या भारत चीन के सुरक्षा जोखिमों को नजरअंदाज करेगा। और क्या भारत चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए एशियाई देशों के साथ गठबंधन बनाएगा..? कई देशों ने चीन पर एंटी डंपिंग शुल्क लगाया है क्या वह इन मतभेदों को अलग रख पाएंगे और अमेरिका का सामना करने के लिए एक साथ आ पाएंगे।

ट्रम्प के टैरीफ वार के साइड इफेक्ट शुरू

ट्रंप की टैरिफ से सोमवार को दुनिया भर के शेयर बाजारों में हड़कंप मच गया। दुनिया के शेयर बाजार में तीन से लेकर 13% तक की भारी गिरावट दर्ज की गई। अमेरिकी शेयर बाजार भी खुलते ही 4% तक लुढ़क गए। इसे लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का एक बयान सामने आया है उन्होंने कहा है कि–” कभी-कभी किसी चीज को ठीक करने के लिए दवा लेनी ही पड़ती है मार्केट में यह गिरावट सिर्फ मेडिसिन की तरह है जो लॉन्ग टर्म में फायदा पहुंचाएगी लेकिन फिलहाल निवेशकों को सिर्फ नुकसान ही दिख रहा है।” दरअसल ट्रंप के टैरिफ एक्शन के बाद अमेरिकी कंपनियों की मार्केट कैप करीब 6 लाख करोड डालर तक घट चुकी है रविवार को टर्म ने कहा था कि वह जानबूझकर शेयर बाजार में गिरावट नहीं ला रहे हैं उन्होंने मार्केट रिएक्शन का अंदाजा नहीं था और जब तक दूसरे देशों के साथ व्यापार घाटे का समाधान नहीं होता तब तक वह कोई डील नहीं करेंगे। उधर डॉलर के मुकाबले रुपए में 26 महीने की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है यह 60 पैसे कमजोर होकर 85 पॉइंट 84 प्रति डॉलर पर आ गया।

किस देश पर कितना टेरीफ —

भारत – 26%

चीन – 34%

वियतनाम – 54%

टाइवान – 34%

यूरोपीय यूनियन – 20%

दक्षिण कोरिया – 25%

जापान – 24%

दुनियाँ में मंदी कि आहट —

अमेरिकी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 0.3% रहने का अनुमान है। गोल्डमैन शेख के अनुसार 12 माह में यहां मंदिर की आशंका 35% से बढ़कर 45% हो गई है। मंडी की आशंका और मांग घटने की आशंकाओं से कमोडिटी की कीमतें घट रही हैं। कच्चा तेल 6.5% सोना 2.4% और चांदी में 7.3% की गिरावट दर्ज हुई है। कॉपर 6.5% जिंक 2% की गिरावट दर्ज करवा रहे हैं। अमेरिका में 10 साल के उस ट्रेजरी बॉन्ड का रिटर्न घट गया है अब अमेरिका में ब्याज दरें घट सकती हैं वहीं ट्रेड वॉर के दर से हमारे ऑटोमोबाइल आईटी मेंटल फार्मा और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में औसतन 7% की गिरावट दर्ज हुई है। शेयर मार्केट में सुनामी के बीच सोमवार को 24 कैरेट सोना 1929 रुपए गिरकर 890 85 रुपए प्रति 10 ग्राम पर आ गया 22 कैरेट सोना 1767 रुपए सस्ता होकर 81602 रुपए हो गया। चांदी प्रति किलो 2518 रुपए सस्ती होकर 90 392 रुपए हो गई।

एलपीजी सिलेंडर 50 रुपए महगा —

गैस सिलेंडर ₹50 महंगा हो गया है जयपुर में मंगलवार से 14 पॉइंट 2 किलो का घरेलू गैस सिलेंडर 808 रुपए की जगह 860 रुपए में बुक होगा। यह बढ़ोतरी प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के 10 करोड़ से ज्यादा लाभार्थियों पर भी लागू होगी। उन्हें अब यह 14 पॉइंट 2 किलो का सिलेंडर 508 रुपए की जगह 558 रुपए का पड़ेगा।

पेट्रोल -डीजल पर 2 रुपए का उत्पाद शुल्क बढ़ा —

पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी ₹2 प्रति लीटर बढ़ा दी गई है हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के चलते खुदरा कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। मतलब यह कि उपभोक्ताओं पर बड़ी हुई कीमतों का कोई असर नहीं पड़ेगा सरकार ने यह कदम सार्वजनिक तिल कंपनियों को हुए घाटे की भरपाई के लिए उठाया है। पेट्रोल पर अब कल केंद्रीय टैक्स 21.9 रुपए और डीजल पर 17.8 रुपए प्रति लीटर हो गया है।

मजबूती के साथ रखनी होगी भारत को अपनी बात

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी पारंपरिक टैरिफ आयात शुल्क योजना की घोषणा कर दी है। यह पारंपरिक टैरिफ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में काफी अनिश्चित और उत्तल-पुथल पैदा कर सकता है। भारत के लिए 27% टैरिफ का यह भुज ऐसे समय पर आया है जब अमेरिका के साथ एक बहुत क्षेत्रीय द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर गहन वार्ता कर रहा है। यह उल्लेखनीय है कि फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान दोनों देशों ने संयुक्त रूप से इन वार्ताओं पर सहमति जताई थी ऐसे में सवाल यह है कि भारत इन वार्ताओं में पारस्परिक टैरिफ के संदर्भ में किस प्रकार का रूख अपनाएगा..?

भारत को केवल अमेरिका के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाने के लिए कोई रियायत नहीं देनी चाहिए पिछले दो महीना में अमेरिका को दी गई कई रियासतों से स्पष्ट है कि ऐसी एक तरफ छूट अमेरिका की मांगों को बढ़ाने की भूख को और बढ़ाएगी। बी टी ए वार्ता केवल पारस्परिक शुल्क हटाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। भारत को अमेरिका को दी जाने वाली हर रियायत के बदले अतिरिक्त बाजार पहुंच सुनिश्चित करनी चाहिए। कपड़ा परिधान और चमड़ा उद्योग जैसे श्रम प्रधान क्षेत्र में शुल्क क्रियाएं होते हैं हासिल करना भारत के लिए महत्वपूर्ण होगा। भारत की रियायतें इस शर्त पर होनी चाहिए कि अमेरिका भविष्य में पारस्परिक शुल्क जैसी उपाय नहीं करने का वचन दे। बता में ऐसा प्रावधान शामिल होना चाहिए कि यदि अमेरिका अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन नहीं करता है तो भारत भी अमेरिका के प्रति अपनी किसी भी प्रतिबद्धता को निभाने के लिए बाध्य नहीं होगा। भारत को बता का दायरा यथासंभव सीमित रखना चाहिए इसे केवल वास्तु व्यापार तक ही सीमित रखा जाए अन्यथा बौद्धिक संपदा अधिकार सरकारी खरीद डिजिटल जैसे मुद्दों वाले कई जटिल क्षेत्र में अमेरिका को रियायत देनी पड़ सकती है। विशेष रूप से पेटेंट के क्षेत्र में अमेरिका की लंबित मांगों पर सावधानी से आगे बढ़ना होगा क्योंकि इससे जेनेरिक दावों के बाजार में प्रवेश में बढ़ाएं उत्पन्न हो सकती हैं। इस क्षेत्र में अमेरिका की मांगों को स्वीकार करने से दावों की कीमतें लगातार बढ़ सकती हैं जिससे सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता एक सपना बंद कर रह जाएगी इससे जन औषधि केंद्र और आयुष्मान भारत जैसी प्रमुख पहलुओं को गंभीर धक्का लगा सकता है। हाल ही में संयुक्त राज्य व्यापार प्रतिनिधि द्वारा जारी 2025 की नेशनल ट्रेड एस्टीमेट रिपोर्ट में भारत की अत्यधिक कृषि सब्सिडी को लेकर चिंता जताई गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की बाजार मूल्य समर्थन योजना घरेलू खाद्य सुरक्षा से कहीं आगे जा चुकी है और इसे भारत को चावल का शीर्ष वैश्विक निर्यातक बना दिया है। ऐसे में आसन का है कि अमेरिका के कृषि व्यवसाय के दबाव में ट्रंप प्रशासन भारत की न्यूनतम समर्थन मूल्य योजना को खत्म करने की मांग कर सकता है। क्योंकि एसपी योजना खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है इसलिए भारत के लिए इस मांग को मनाना लगभग असंभव होगा अतः भारत को वार्ता में इस मुद्दे को शामिल करने का विरोध करना चाहिए।

क्योंकि भारत में करोड़ों लोगों की आजीविका कृषि पर निर्भर है इसलिए वार्ता में अनाज चिकन अधिकांश डेयरी उत्पाद ताजा फल और सब्जियां तथा सूखे मेवे जैसे कृषि उत्पादों को पारस्परिक शुल्क कटौती से बाहर रखा जाना चाहिए। भारत का अमेरिका के साथ कई अलग-अलग क्षेत्र में जुड़ाव है हालांकि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्र में जुड़ाव का प्रभाव किसी भी अन्य क्षेत्र के परिणाम की तुलना में अधिक व्यापक और अर्थव्यवस्थव्यापी प्रभाव डालने वाला हो सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि BTA वार्ताओं का परिणाम संतुलित हो साथ ही बाजार के घरेलू हितों की रक्षा और संवर्धन हो। अमेरिका के साथ अन्य क्षेत्रों में लाभ हासिल करने के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारत के हितों से समझौता नहीं किया जाना चाहिए। पारस्परिक आयात शुल्क विश्व व्यापार संगठन में अमेरिका की प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन करते हैं इसलिए यह अवैध हैं। भारत को वित्तीय वार्ता सहित विभिन्न मंचों पर अमेरिका को यह बात कहने में संकोच नहीं करना चाहिए कि वित्तीय वार्ता में इस बात पर बार-बार जोर देना चाहिए कि एक आर्थिक रूप से मजबूत और सशक्त भारत अमेरिका के हित में होगा। खासकर चीन के खिलाफ एक संतुलन के रूप में। ऐसा न्याय संगत और संतुलित द्विपक्षीय व्यापार समझौता जो भारत के किसानों और श्रमिकों को कमजोर न करें और ने ही सस्ती दावों तक पहुंच को प्रभावित करें भारत और अमेरिका दोनों के हित में होगा।

प्रभावित देश एकजुट हुए तो अमेरिका को नुकसान संभव

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यापारिक भागीदारों पर व्यापक टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी है उन्होंने 170 से अधिक देशों के लिए नई टैरिफ दलों की घोषणा की है। कंपनी भारत पर 27 प्रतिशत पारस्परिक टैरिफ लगाया है इस प्रकार चीन पर 34% वियतनाम पर 46% दक्षिण कोरिया पर 25% यूरोपीय संघ पर 20% और अन्य देशों को भी उच्च टैरिफ की व्यापार बढ़ाओ का सामना करना पड़ेगा।

वित्तीय वर्ष 2025 26 के बजट में भारत सरकार ने टेरिफ वार को भागते हुए कई वस्तुओं पर सीमा शुल्क में कटौती की थी। बजट के दौरान 6 फीस दी डिजिटल सर्विस टैक्स जो गूगल टैक्स के रूप में भी जाना जाता है को भी वापस लिया था। इन सब प्रयासों के बावजूद बी निशिता के बादल बने हुए हैं जनवरी के महीने से शेयर बाजार भी तारीफ बार की चपेट में आ गया है राष्ट्रपति ट्रंप के अप्रत्याशित निर्णय लेने की आदत के कारण एवं विश्वास और अस्तित्व की स्थिति बनी हुई है।

आयात एवं निर्यात कर लगाने के कई कारण होते हैं इनमें घरेलू उद्योगों को संरक्षण देना प्रमुख कारण है। उदाहरण के तौर पर भारत कई बार केमिकल स्टील सोलर पैनल आदि की डंपिंग को रोकने के लिए भारी आयात शुल्क लगता है। कई बार राष्ट्रीय सुरक्षा पर्यावरण की रक्षा और हानिकारक वस्तुओं को रोकने के लिए भी अधिक शुल्क लगाया जाता है। देश की आर्थिक स्थिति प्रोडक्ट उत्पादन और टेक्नोलॉजी का स्तर अलग-अलग होने से आयात शुल्क में अंतर होना लाजमी है। अमेरिका के द्वारा आयात शुल्क बधाई जाने पर भारत के निर्यात पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा इस आसन का से इनकार नहीं किया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रभाव निर्यात के 10 से 12 फ़ीसदी तक हो सकता है जो लगभग 8 से 10 बिलियन डॉलर होगा। इस व्यापार व्यवधान के कारण भारत की अर्थव्यवस्था पर जो प्रभाव पड़ेगा वह जीडीपी का 0.1 फ़ीसदी से भी काम होगा यह प्रभाव भी कुछ समय तक ही रहने की संभावना है हालांकि भारत ने इस प्रभाव को कम करने के लिए ब्रिटेन ऑस्ट्रेलिया यूरोपीय यूनियन मिडल ईस्ट आदि देशों के साथ सक्रियता से व्यापार समझौते पर रणनीतिक रूप से काम करना शुरू कर दिया है। अमेरिका ने कई देशों पर उच्च टैरिफ लगाया है कई देशों पर यह भारत से भी अधिक है जिससे भारत को तुलनात्मक तौर पर हानि होने की संभावना खत्म सी हो जाती है बल्कि अनुकूल प्रतिस्पर्धा से फायदा भी हो सकता है। भारत के लिए तारीफ वार की परिस्थितियों आपदा में अवसर के सामान भी हो सकती हैं और वह परस्पर सहयोग से ट्रेड में अपनी भागीदारी बढ़ा सकता है। 2023 में वैश्विक माल निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 1.8 फ़ीसदी थी इसे बनाने का यह एक मौका है।

दूसरी ओर टैरिफ बार से अमेरिका और वैश्विक अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लग सकता है। अमेरिका फेडरल रिजर्व के पूर्वानुमानों के अनुसार इस वर्ष अमरी की अर्थव्यवस्था की सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 1.7 फ़ीसदी रहेगी जो दिसंबर के अनुमान 2.3 फिसदी से काफी कम है। आया तो शुल्क लगने से अमेरिका में आने वाला सामान महंगा हो जाएगा इस संबंध में फेड अध्यक्ष जेरोम पावेल का मानना है कि तेरे फुहार मुद्रा स्पीति के दृष्टिकोण से अमेरिका के लिए घातक होगा। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मौद्रिक अथवा वित्तीय नीति व्यापार युद्ध के विपरीत प्रभावों की भरपाई नहीं कर सकती। जेपी मॉर्गन के अनुसार हाल ही की व्यापार नीतियों के कारण अमेरिका में मंडी की संभावना 40 फ़ीसदी तक बढ़ गई है। वरिष्ठ अर्थशास्त्री केल्विन ने तो यहां तक कह दिया है कि टैरिफ के कारण आर्थिक मंदी के साथ-साथ मुद्रास्फीति और ढीले जो मार्केट के कारण अर्थव्यवस्था की विकास दर अगली 3 सालों में 0.32 फ़ीसदी तक जा सकती है।

अमेरिका का यह मानना है कि वह घरेलू खपत की आपूर्ति उत्पादन बढ़ाकर कर लेगा व्यावहारिक नहीं लगती। जानकारों का मानना है कि घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए कम से कम तीन से पांच वर्ष का समय चाहिए। यह बात उसे गहरे आर्थिक संकट में धकेल सकती है जो मुद्रा जनित आर्थिक मंदी का कारण हो सकती है। कुल मिलाकर अमेरिका का यह कदम उसकी अर्थव्यवस्था के लिए आत्मघाती भी साबित हो सकता है। दूसरा यह कि यदि अमेरिका भारत पर दबाव बनाने के उद्देश्य 27 विधि उच्च टैरिफ लगाना जारी रखता है तो व्यापार क्षेत्र में तनाव के रिश्तों का प्रशांत महासागर में रणनीतिक साझेदारी पर गहरा असर पड़ सकता है। और अंत में महत्वपूर्ण बात यह भी है कि सभी देश टैरिफ बार की चपेट में आने के कारण एक दूसरे से मिलकर काम करेंगे जिससे अमेरिका आर्थिक तौर पर अलग-अलग हो सकता है

इस चित्र का आल्ट गुण खाली है; इसका फ़ाइल नाम Screenshot_2025-03-29-12-50-55-536_com.google.android.googlequicksearchbox-1024x550.jpg है

नया टैरीफ भारत के लिए चुनौती भी, तो अवसर भी —

विश्व व्यापार संगठन के समझौता की धज्जियां उड़ाते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक तरफ रिसिप्रोकल टैरिफ की घोषणा कर विश्व व्यापार के क्षेत्र में हलचल पैदा करदी है। हालांकि 9 अप्रैल से लागू होने वाले इस टैरिफ को इन वक्त पर ट्रंप प्रशासन ने 90 दिन के लिए रोक दिया है। नई टैरिफ दारू की गणना और देश में चुनाव की त्रिकोण ने सभी अर्थशास्त्रियों और व्यापार विश्लेषकों को चौंका दिया है।

कहां जा रहा है कि अमेरिकी गणनाकारों ने प्रत्येक देश से अमेरिका का व्यापार घाटा लिया और उसे उस देश से हो रहे आयात से भाग देकर उसकी घाटा दर निकाली और उसे आधा कर उसकी टैरीफ दरक्योंकि प्रतिस्पर्धी चीन थाईलैंड वियतनाम इंडोनेशिया पाकिस्तान बांग्लादेश आदि की तारीफ करें भारत से बहुत अधिक हैं इसके अतिरिक्त विश्व की सप्लाई चैन में की घोषणा कर दी। दुनिया का कोई भी अर्थशास्त्री इस अजीब फार्मूले का समर्थन नहीं करेगा। आश्चर्य की बात है कि यदि व्यापार घाटा ही गणना का आधार है तो फिर आस्ट्रेलिया ब्रिटेन अरब देश और अर्जेंटीना जैसे देशों पर टैरिफ क्यों और कैसे लगाया है..? इन देशों से तो अमेरिका का व्यापार घाटे में नहीं है। कंजरवेटिव कानून वेदों के समूह ने इस न्यायालय में चुनौती दी है ट्रंप प्रशासन ने 60 व्यापार घाटे वाले देशों पर रैसिप्रोकल टैरिफ लगाया है। यह दर वर्तमान ड्यूटी सामान के अतिरिक्त है। बाकी सभी देशों पर 10% टैरिफ होगा। चीन पर 34% बांग्लादेश पर 37% पाकिस्तान पर 29% श्रीलंका पर 44% वियतनाम पर 46% थाईलैंड पर 36 प्रतिशत इंडोनेशिया पर 32% भारत पर 26% जापान पर 24% यूरोपीय देशों पर 20% और ब्रिटेन पर 10% टैरिफ लगाया गया है। भारत के संदर्भ में देखें तो चुनौतियां निश्चित रूप से हैं लेकिन जो परिस्थितियों को अवसर में और अवसरों को समृद्धि में बदलते हैं वही विजेता होते हैं। यदि भारत का अमेरिका को निर्यात 10% से भी प्रभावित होता है तो हमारी जीडीपी 0.2% काम हो सकती है किंतु अन्य देशों के निर्यात में कमी से भारत का व्यापार घटेगा नहीं अपितु बढ़ेगा। अमेरिका में टैरिफ के कारण कई ऐसी वस्तुएं जो अत्यावशक नहीं है उनका उपयोग कम हो जाएगा जैसे डेरी उत्पादन जावरा ऑटोमोबाइल मेटल आदि। भारत का निर्यात इन वस्तुओं में घटेगा। किंतु आवश्यक उपयोग की वस्तुएं जो सामान्यतः अमेरिका में काम उत्पादित होती हैं, या नहीं होती है जैसे –टेक्सटाइल,फार्मा,आईटी,चिप्स,मोबाइल फोन,मशीनरी खिलौने, इलेक्ट्रॉनिक्स कैपिटल, गुड्स,सोलर पैनल्स,सस्ती कारें, मिनरल फ्यूल,स्टोन ऑर्गेनिक,केमिकल्स आदि का निर्यात बढ़ सकता है। क्योंकि प्रतिस्पर्धी चीन थाईलैंड वियतनाम इंडोनेशिया पाकिस्तान बांग्लादेश आदि की तारीफ करें भारत से बहुत अधिक हैं इसके अतिरिक्त विश्व की सप्लाई चैन में बदलाव भी भारत के पक्ष में जाने की संभावना है। ट्रंप के टैरीफ वार के कई उद्देश्य दिखते हैं जैसे —

— अमेरिका को स्थानीय उद्योगों की मजबूती यानी मेक इन अमेरिका को बढ़ावा देना।

— स्थानीय उद्योगों के माध्यम से अमेरिका में नए रोजगार पैदा करना।

— अमेरिका के व्यापार घाटे को कम कर टैरिफ की आय से क्षतिपूर्ति करना।

— खर्चों में कटौती करना तथा बॉन्ड की दरों में कमी कर ब्याज के खर्चों में कटौती करना।

उल्लेखनीय है कि ट्रंप के आने के बाद बंद की यील्ड 4.79 प्रतिशत से गिरकर 4 पॉइंट 17 प्रतिशत हो गई यानी 0.62 प्रतिशत घटी है। अमेरिका पर 36.5 ट्रिलियन डॉलर अर्थात भारत की जीडीपी का 10 गुना का कर्ज है यानी 2.26 ट्रिलियन डॉलर की बचत है। कहां जा रहा है कि टैरिफ लगाने से अमेरिका में महंगाई बढ़ेगी रोजगार व विकास दर घटेगी शेयर बाजार में मंडी का असर आएगा और डॉलर गिरेगा यह प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है।

क्या कदम उठाने चाहिए भारत को —

भारत को दिन प्रतिदिन बदल रही परिस्थितियों को देखते हुए सोच समझकर कदम उठाने होंगे। इस ट्रेड वॉर में अभी कई मोड़ आएंगे। एट जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। और धैर्य रखना चाहिए किंतु सचेत सजग और तैयार रहना चाहिए। भारत के लिए आने वाले अवसरों को खोजा जाना चाहिए। इसके लिए कई कार्य योजनाओं पर अमल किया जा सकता है जैसे —

–अमेरिका के साथ चल रहे द्विपक्षीय व्यापार समझौते (बी टी ए ) पर तेजी से किंतु मजबूती के साथ आगे बढ़ा जाए, जो वस्तुओं तक ही सीमित रखा जाए जहां टेरेस सीधा समान स्तर पर अमेरिकी माल से इस स्प्रेधा करता है। शिव पेटेंट आईटी कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा तथा पिछड़े क्षेत्रीय विकास कार्यक्रमों को ईस्वीपक्षीय समझौते के दायरे से बाहर रखकर भारत के व्यापक हितों की रक्षा की जानी चाहिए।

जब अधिक तारीफ वाले देशों से उत्पादन भारत आने लगे तब एनएचसी निवेश के लिए व्यापक पॉलिसी सुधार आवश्यक होंगे जो विदेशी निवेश को आकर्षित करेंगे। मेक इन इंडिया को मजबूती देने के लिए सस्ता कच्चा माल उपलब्ध कराना वैल्यू चेक को मेक इन इंडिया के अनुकूल बनाना भी आवश्यक है। इसके लिए नियामक आयोग प्रस्तावित है। चीन जैसे देश जिन पर भारी तेरे फेवी अपना अतिरिक्त माल भारत में डंप कर सकते हैं। आते भारत को इस पर और 20 सतर्क रहकर ड्यूटी लगाने के लिए तैयार रहना होगा। भारत को आर्थिक रोजगार और औद्योगिक कानून को कानून को सुगम बनाकर औद्योगिक और व्यापार व्यवस्था मैं तत्काल सुधार की ओर बढ़ना होगा बड़े हुए टैरिफ के प्रभाव प्रक्रियाओं सुधारो और उठाए जाने वाले कदमों और प्रस्तावित करने तथा उन्हें त्वरित गति से लागू करने के लिए एक विशेषागों की टास्क फोर्स बनानी भी जरूरी है जो लघु व दीर्घकालिक योजना पर कार्य करें।

इस चित्र का आल्ट गुण खाली है; इसका फ़ाइल नाम IMG_20230908_134557-768x1024.jpg है

फोटो – kedar lal ( सिंह साब ) चीफ एडिटर arthikfunda.com

लेखक के बारे में–

मेरा नाम केदार लाल है, मुझे प्यार से सिंह साहब और K. S. Ligree के नाम सभी जाना जाता है। मैं राजस्थान राज्य के करौली जिले के अंतर्गत एक छोटे से गांव टुड़ावाली का रहने वाला हूं। मैंने राजस्थान विश्वविद्यालय और वर्धमान महावीर विश्वविद्यालय से बीए, एमए, बीएड, MBA, BJMC ( पत्रकारिता ) की शिक्षा प्राप्त की है। मैंने कई अखबारों तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कार्य किया है। मैंने कई वर्षों तक शिक्षक के तौर पर भी कार्य किया है। मैं कई वर्षों से ब्लॉगर और वर्ड प्रेस पर अपने आर्टिकल लिखता हूं। मुझे लिखने का बहुत शौक है। मुझे घूमना, समाचार सुनना,अखबार पढ़ना,पत्रिकाएं पढ़ना, समाचार देखना, डिबेट कार्यक्रम देखना, अंतरराष्ट्रीय घटनाओं के बारे में जानकारियां प्राप्त करना, विश्व के करंट मुद्दों के बारे में पढ़ना, लॉन्ग ड्राइव पर जाना और पर्वतीय क्षेत्रों में घूमना बहुत पसंद है।

URL — arthikfunda.com

केदार लाल — चीफ एडिटर arthikfunda.com

क्या है डीपसीक..? और कैसे deepseek ने दुनियाँ को यह सिखा दिया कि-“इनोवेशन की फ्यूचर है।”

arthikfunda.com

टुडावली, करौली, राजस्थान – 321610

क्या है डीपसीक..?  ओर कैसे डीपसीक ने दिखा दिया कि नवप्रवर्तन ही भविष्य है…।

का मतलब है डीपसीक (deepceek) का..?

डीपसीक एक शक्तिशाली सॉफ्टवेयर है जो डीप लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करके विभिन्न कार्यों को पूरा करता है। यह सॉफ्टवेयर विभिन्न प्रकार के डेटा को प्रोसेस कर सकता है, जैसे कि टेक्स्ट, इमेज, वीडियो और ऑडियो। डीपसीक का उपयोग विभिन्न क्षेत्रों में किया जा सकता है, जैसे कि प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण, इमेज प्रोसेसिंग, वीडियो प्रोसेसिंग और ऑडियो प्रोसेसिंग।डीपसीक के कई लाभ हैं, जैसे कि स्वचालित प्रोसेसिंग, उच्च सटीकता और समय की बचत। यह सॉफ्टवेयर विभिन्न प्रकार के कार्यों को पूरा कर सकता है, जैसे कि चैटबॉट बनाना, इमेज रिकॉग्निशन, वीडियो विश्लेषण और ऑडियो प्रोसेसिंग। डीपसीक का उपयोग विभिन्न उद्योगों में किया जा सकता है, जैसे कि स्वास्थ्य सेवा, वित्त और शिक्षा।डीपसीक के उदाहरणों में चैटबॉट, इमेज रिकॉग्निशन सॉफ्टवेयर और वीडियो विश्लेषण सॉफ्टवेयर शामिल हैं। यह सॉफ्टवेयर विभिन्न प्रकार के डेटा को प्रोसेस कर सकता है और विभिन्न कार्यों को पूरा कर सकता है। डीपसीक का उपयोग विभिन्न क्षेत्रों में किया जा सकता है और यह विभिन्न प्रकार के लाभ प्रदान करता है।


डीपसीक बनाम ओपनएआई: चीन की नई एआई क्रांति और भारत के लिए सबक

दुनिया इस समय एक नए तकनीकी युग में प्रवेश कर चुकी है, जहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI) न केवल उद्योगों को, बल्कि अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन को भी बदल रही है। इसी दिशा में वर्ष 2023 में चीन द्वारा विकसित किया गया डीपसीक (DeepSeek) मॉडल वैश्विक ध्यान का केंद्र बना हुआ है। इसे केवल 56 मिलियन डॉलर (लगभग ₹465 करोड़) की लागत से तैयार किया गया, जबकि इतने ही स्तर का मॉडल अमेरिका या यूरोप में विकसित करने के लिए अरबों डॉलर की आवश्यकता होती है।

डीपसीक की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि तकनीकी नवाचार केवल पूंजी पर निर्भर नहीं होता, बल्कि दृष्टिकोण, डेटा उपयोग की दक्षता और रणनीतिक नीति पर आधारित होता है। चीन ने इस मॉडल के ज़रिए दिखाया है कि सीमित संसाधनों में भी AI के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व हासिल किया जा सकता है।

दूसरी ओर, Google का Gemini और OpenAI का ChatGPT जैसे मॉडल अरबों डॉलर की भारी पूंजी के साथ विकसित किए गए हैं। इन कंपनियों ने सुपरकंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, विशाल डेटा केंद्रों और उच्च तकनीकी प्रतिभा में बड़ा निवेश किया। इसके बावजूद DeepSeek जैसे मॉडल का प्रदर्शन यह दर्शाता है कि नवाचार और व्यावहारिकता का संतुलन कितनी बड़ी शक्ति बन सकता है।

भारत के लिए यह विषय विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। जून 2023 में OpenAI के सीईओ सैम ऑल्टमैन भारत दौरे पर आए थे। तकनीकी विशेषज्ञ राजन आनंदन ने उनसे पूछा था कि क्या भारत अपना खुद का “फाउंडेशन एआई मॉडल” विकसित कर सकता है? ऑल्टमैन का उत्तर निराशाजनक था — उन्होंने कहा कि यह “लगभग असंभव” है, क्योंकि इसके लिए अरबों डॉलर, विशाल डेटा और अत्यधिक कंप्यूटिंग पावर की आवश्यकता होगी। परंतु DeepSeek का उदाहरण इस धारणा को चुनौती देता है।

चीन का यह मॉडल यह सिखाता है कि यदि कोई राष्ट्र स्पष्ट रणनीति, अनुसंधान में आत्मनिर्भरता और तकनीकी कुशलता विकसित करे, तो सीमित पूंजी में भी चमत्कार किया जा सकता है। भारत के पास दुनिया के सबसे बड़े डेटा संसाधनों में से एक है, और एक विशाल युवा टेक्नोलॉजी कार्यबल है। यदि इन्हें संगठित किया जाए, तो भारत भी अपने स्वदेशी फाउंडेशन एआई मॉडल का निर्माण कर सकता है।

तकनीकी जगत में यह भी चर्चा है कि DeepSeek ने पारंपरिक डीप लर्निंग की अवधारणा को नए सिरे से परिभाषित किया है। इसका प्रशिक्षण (training) और डेटा ऑप्टिमाइजेशन मॉडल अधिक कुशल और ऊर्जा-संतुलित हैं। यही वजह है कि यह कम लागत में भी उच्च क्षमता दिखाने में सफल रहा।

भविष्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल तकनीकी उपकरण नहीं रहेगी — यह आर्थिक, राजनीतिक और दार्शनिक दिशा भी तय करेगी। DeepSeek ने यह संकेत दिया है कि एआई का असली मुकाबला धन के आकार से नहीं, बल्कि विचारों की गहराई से होगा।

Ai टेक्नोलॉजी का दौर

DeepSeek की सफलता दुनिया के सभी विकासशील देशों के लिए प्रेरणा है। यह बताती है कि यदि नवाचार को प्रोत्साहित किया जाए, अनुसंधान में स्वतंत्रता दी जाए, और युवा प्रतिभाओं को अवसर मिलें, तो अरबों डॉलर की आवश्यकता नहीं — संकल्प और रणनीति ही भविष्य के एआई युग की सच्ची पूंजी हैं। भारत को अब केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि सृजनकर्ता राष्ट्र बनने की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए।

Deepseek ने कैसे दिखाया दुनिया को की -“इनोवेशन ही फ्यूचर है

“DeepSeek ने कैसे दुनिया को दिखा दिया कि इनोवेशन ही फ्यूचर है” वास्तव में यह सिर्फ एक टेक्नोलॉजी की कहानी नहीं, बल्कि नवाचार (Innovation) की ताकत का जीता-जागता उदाहरण है। नीचे इसे विस्तार से समझिए

DeepSeek: एक नई तकनीकी क्रांति की शुरुआत है। DeepSeek एक अत्याधुनिक AI मॉडल है जिसे चीन में विकसित किया गया है। यह मॉडल इस बात का प्रमाण बन चुका है कि नवाचार और तकनीकी सोच (Innovative Thinking) किसी भी देश या संगठन को वैश्विक स्तर पर अग्रणी बना सकती है। 2023 में मात्र 56 मिलियन डॉलर की लागत से तैयार किया गया यह मॉडल आज कई बड़े अंतरराष्ट्रीय एआई प्रोजेक्ट्स के बराबर खड़ा है। इनोवेशन की शक्ति: सीमित संसाधनों में असंभव को संभव बनानाजहां अमेरिकी कंपनियां अरबों डॉलर एआई मॉडल्स में निवेश करती हैं, वहीं DeepSeek ने दिखाया कि सीमित संसाधनों के बावजूद अगर सोच नई और दृष्टिकोण मौलिक हो तो बड़ी छलांग लगाई जा सकती है।इसने एआई को ज्यादा किफायती,ऊर्जा दक्ष (Energy Efficient), औरलोकल जरूरतों के अनुरूप (Localized) बनाने पर ध्यान दिया।इससे साबित हुआ कि असली प्रगति पैसों से नहीं, बल्कि नवाचार के दृष्टिकोण से होती है।

दुनिया के लिए प्रेरणाDeepSeek का असर इतना गहरा रहा कि अब अन्य देश भी “स्मार्ट, सस्टेनेबल और लो-कॉस्ट इनोवेशन” की दिशा में सोचने लगे हैं।यह दिखाता है कि भविष्य उसी का है जो नई तकनीकों को अपनाने के साथ-साथ उन्हें स्थानीय जरूरतों के अनुसार ढालने की हिम्मत रखता है।—? निष्कर्षDeepSeek ने यह साबित कर दिया कि —> “भविष्य की दौड़ पूंजी की नहीं, क्रिएटिव आइडिया और इनोवेशन की होगी।”जिसने यह समझ लिया, वही कल की दुनिया का नेतृत्व करेगा।—क्या आप चाहेंगे कि मैं इस पर एक ब्लॉग आर्टिकल (500–600 शब्दों का) तैयार कर दूं जिसे आप सीधे अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर सकें?


Deepseek दो शब्दों से मिलकर बना है । इस हिसाब से अगर हम दीपसीक का शाब्दिक मतलब समझने की कोशिश करते हैं तो इसका मतलब है। “डीप” – का मतलब रिसर्च, इनोवेशन और बेहतर अंडरस्टैंडिंग से है. इसमें ‘मुश्किल से मुश्किल’ क्वेरी का जवाब देना है शामिल है.डीपसीक में “सीक” का मतलब नॉलेज, डिस्कवरी और लगातार अपडेट के लिए है. ये कटिंग-एज सॉल्यूशन के लिए कंपनी की कमिटमेंट को दिखाता है.विजुअल डिजाइन की तरफ ध्यान दें तो डीपसीक लोगो के डिजाइन में लहरें और परतें नजर आ रही हैं. ये एक्सप्लोरेशन प्रोग्रेस और इनोवेशन के सफर का प्रतीक है. डीपसीक लोगो नॉलेज-ड्राइवन आइडेंडिटी को दिखाता है.ब्लू शेड्स ट्रस्ट, इंटेलिजेंस और टेक्नोलॉजी को दिखाती हैं. क्रिएटिविटी और पावर को दिखाने के लिए इसमें वाइब्रेंट कलर्स यूज किए गए हैं.क्या है डीपसीक?DeepSeek-V3 मॉडल एक एडवांस्ड ओपन-सोर्स AI सिस्टम है. ये कुछ ही समय में कई देशों में पॉपुलर हो गया है. यूएस, यूके और चीन में इस चैटबॉट का जलवा नजर आ रहा है.DeepSeek को किसने बनाया?Liang Wenfeng डीपसीक को बनाया है. इन्होंने अमेरिका को एआई वर्ल्ड में करारा जवाब दिया है. चैटजीपीटी के टक्कर में अपना चैटबॉट लाकर मार्केट में अवेलेबल सभी एआई कंपनियों के छक्के छुड़ा दिए हैं. वैसे यहां तक का सफर काफी दिलचस्प रहा है.

विश्व परिवर्तनशील है और विश्व में सदैव परिवर्तन नजर आते रहते है। और ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि “परिवर्तन ही संसार का नियम है”  इंटरनेट की दुनिया में भी बदलाव दृष्टिगोचर होते हैं। कहीं भी नए टूल्स हमें देखने को मिलते हैं। चीन के नए आई टूल्स डीप लर्निंग इन दोनों पर आधारित भूचाल

सस्ते चीनी मॉडल ने कैसे मचाया दुनिया में तहलका

DeepSeek: सस्ते चीनी AI मॉडल ने कैसे मचाया तहलका? Chatgpt को खुली चुनौती

DeepSeek AI: डीपसीक का प्रमुख आकर्षण इसका ओपन सोर्स होना है, जो अन्य एआई मॉडल्स की तुलना में 95 प्रतिशत सस्ता है. इसकी एक और खासियत यह है कि इसे छोटे हार्डवेयर पर भी आसानी से चलाया जा सकता है, जो इसे छोटे व्यवसायों और शोधकर्ताओं के लिए भी सुलभ बनाता है.

DeepSeek AI: 20 जनवरी 2024 को लॉन्च हुए चीन निर्मित डीपसीक एआई मॉडल के नवीनतम संस्करण आर1 ने तकनीकी दुनिया में हलचल मचा दी है. अब ओपन सोर्स और किफायती तरीके से उपलब्ध इस एआई मॉडल को लेकर निवेशकों और विशेषज्ञों में भारी उत्साह है. डीपसीक ने एआई उद्योग में नये मानक स्थापित किये हैं और यह ऐपल स्टोर में सबसे अधिक डाउनलोड किये जाने वाले ऐप्स में शामिल ह

डीपसीक का आर1 मॉडल व्यवसाय जगत के लिए भी बड़े बदलाव का संकेत दे रहा है. सोमवार (27 जनवरी) को एनवीडिया जैसी चिप निर्माण दिग्गज कंपनी को लगभग 600 अरब डॉलर का नुकसान हुआ, जिससे अमेरिकी शेयर बाजार में भारी गिरावट आई. यह घटना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि अमेरिका ने चीन को उन्नत चिप्स की आपूर्ति पर कई प्रतिबंध लगाये हैं.

सस्ता और प्रभावी : डीपसीक का ओपन सोर्स मॉडल

डीपसीक का प्रमुख आकर्षण इसका ओपन सोर्स होना है, जो अन्य एआई मॉडल्स की तुलना में 95 प्रतिशत सस्ता है. इसकी एक और खासियत यह है कि इसे छोटे हार्डवेयर पर भी आसानी से चलाया जा सकता है, जो इसे छोटे व्यवसायों और शोधकर्ताओं के लिए भी सुलभ बनाता है. एपीआई की कीमत सिर्फ 0.55 डॉलर प्रति मिलियन टोकन है, जो ओपन एआई के मुकाबले बहुत कम है.

चीन के तकनीकी वर्चस्व को बढ़ावा

डीपसीक की सफलता ने चीन के तकनीकी क्षेत्र को मजबूती दी है और इससे अमेरिका की एआई प्रौद्योगिकियों पर निर्भरता को चुनौती मिली है. यह मॉडल अमेरिकी चिप निर्माताओं और एआई कंपनियों के लिए एक गंभीर चुनौती साबित हो सकता है, क्योंकि इसका प्रशिक्षण कम लागत पर संभव है और यह उच्च गुणवत्ता वाले परिणाम प्रदान करता है.

निवेशकों के लिए नई संभावना

वर्तमान में, डीपसीक एक निजी स्वामित्व वाली कंपनी है, जिससे यह आम निवेशकों के लिए उपलब्ध नहीं है. लेकिन चीन सरकार की ओर से इसे मिले समर्थन और डीपसीक के द्वारा प्रदान की गई किफायती तकनीक को देखते हुए, यह भविष्य में अन्य देशों के उद्यमियों के लिए भी एक नयी उम्मीद बन सकता है.

क्या डीपसीक अमेरिका के लिए खतरा बनेगा?

डीपसीक की सफलता ने तकनीकी दुनिया में नये सवाल खड़े किए हैं, खासकर उन प्रतिबंधों के संदर्भ में जो अमेरिका ने चीन के खिलाफ लागू किये हैं. क्या यह कम लागत वाला एआई मॉडल, जो आसानी से उपलब्ध है, एआई उद्योग के परंपरागत खिलाड़ियों के लिए खतरा बनेगा? यह सवाल भविष्य में एआई के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बन सकता है.

 निर्माण लगभग 2 साल पहले ‘ऑन होम’ नाम की अमेरिकी कंपनी से आया था। ओपन स्टूडियो की अकल्पनीय कृतियों से लॉन्च की गई चैट स्नैपटी के माध्यम से दुनिया को चौंका दिया गया था। डिपासिक ने भी “आर -1” सेक्रवेटिव आई चैट बॉक्स लॉन्च किया है जिसमें चैट गुप्ता से भी बेहतर बताया जा रहा है हालांकि पिछले 2 वर्षों में सैकडो आर्टिस्टिव का एक मॉडल विकसित हुआ है इसलिए डीप सी के रूप में एक और शक्तिशाली चैट बॉक्स का आना रिलीज है कोई आकाश आकाश जैसी बात नहीं होनी चाहिए। फिर ऐसा हुआ कि पिछले 27 जनवरी को अमेरिकी शेयर बाजार में गिरावट आई और न्यूजीलैंड के इतिहास में पहली बार किसी कंपनी का बाजार मूल्य एक ही दिन में 500 अरब डॉलर गिर गया। अमेरिका की बड़ी टेक्निकल कंपनी को करीब एक ट्रिलियन डॉलर का झटका लगा।

Liang Wenfeng डीपसीक को बनाया है. इन्होंने अमेरिका को एआई वर्ल्ड में करारा जवाब दिया है. चैटजीपीटी के टक्कर में अपना चैटबॉट लाकर मार्केट में अवेलेबल सभी एआई कंपनियों के छक्के छुड़ा दिए हैं. वैसे यहां तक का सफर काफी दिलचस्प रहा है.

क्या एआई (Ai) की दौड़ में चीन, अमेरिका से आगे निकल रहा है..? 

यह सवाल यकायक हमारे सामने आकर खड़ा हो गया है। चीन 2030 तक आई कि विश्व शक्ति बनने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। दीप सिंह आई के क्षेत्र में उसकी यह अकेली बड़ी चलांग नहीं ह। “डीपसीक आर 1” फर्स्ट के लांच होने के 3 दिन बाद ही चीनी कंपनी अली बाबा ने दावा किया है कि उसके ‘क़ुवेन 2.5’ नामक मॉडल ने दीपसी के सबसे उन्नत मॉडल को भी पीछे छोड़ दिया है…। इससे पहले बाइदु कंपनी ने भी “अर्निंबाट” के जरिए पश्चिमी कंपनियों को चुनौती दी थी

 Ai टेक्नोलॉजी में पेटेंटों का दौर

एआई के क्षेत्र में पेटेंट किए जाने के मामले में चीन पहले नंबर पर है।इसके पेटेंट की संख्या अमेरिका की तुलना में 6 गुना ज्यादा है। वो के अनुसार 2023 तक चीन में 38210 पेटेंट दर्ज किए गए। जबकि अमेरिका में यह संख्या मात्र ₹6276 रही। अभी यह कहना तो जल्दबाजी होगी कि चीन आई की दौड़ में अमेरिका से आगे निकल रहा है लेकिन मौजूदा स्थिति को देखें तो वह बराबर का टक्कर दे रहा है। यह तब हो रहा है जब अमेरिका ने राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिताओं से चीन को अत्यधि के निर्यात पर प्रतिबंध लगा रखा है। हालांकि माना जाता है कि चीनी कंपनियां इसको दूसरे रास्तों से हासिल कर रही है।

 

छोटी छोटी घरेलू बचत और निवेश संबंधी जानकारियां।
आर्थिक फंडा (ब्लॉग )