
समझे, कैसे बड़ी महिलाओं की हिस्सेदारी..।
- छोटे शहरों से बड़ा योगदान
- डिजिटल टेक्नोलॉजी और फाइनेंस की आसान भाषा से हुआ फायदा।
- एस आई पी महिलाओं की पहली पसंद।
- निवेश में पुरुषों से अधिक धैर्य।
- घर की मैनेजर महिलाएं।
- अगले तीन से पांच साल में नई ट्रेड।
- महिलाओं की हिस्सेदारी में 40% तक की बढ़ोतरी।
Women Investors in India: भारत में महिलाओं की वित्तीय बाजारों में भागीदारी पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। SBI Ecowrap रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2022 से महिला निवेशकों की भागीदारी में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। रिपोर्ट बताती है कि FY25 में रजिस्टर्ड निवेशकों में महिलाओं की भागीदारी 1.3% बढ़कर 23.9% पर पहुंच गई है, जो FY22 में 22.6% थी। यह वृद्धि न केवल वित्तीय समावेशन को बल देती है, बल्कि यह भारत में लैंगिक समानता की ओर बढ़ते कदमों का भी प्रतीक है।दिल्ली-महाराष्ट्र टॉप पर, देखें बाकी राज्यों का हालरिपोर्ट के अनुसार, कुछ राज्यों में वित्तीय बाजारों में महिला निवेशकों की भागीदारी राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। बड़े राज्यों में दिल्ली (29.8%), महाराष्ट्र (27.7%) और तमिलनाडु (27.5%) में FY25 में इस साल अभी तक महिलाओं की भागीदारी देश के औसत 23.9% से ज्यादा रही। हालांकि, बिहार (15.4%), उत्तर प्रदेश (18.2%) और ओडिशा (19.4%) जैसे राज्य 20% से कम महिला भागीदारी के साथ पिछa एवरेज से ज्यादा, म्युचुअल फंड निवेशकों की पहली पसंदहिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ का प्रदर्शन बेहतर, असम सबसे पीछेपिछले तीन वर्षों में, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में महिलाओं निवेशकों की भागीदारी में 3% से अधिक की वृद्धि देखी गई है। यह इंगित करता है कि देश के विभिन्न क्षेत्रों में वित्तीय साक्षरता (financial literacy) और जागरूकता बढ़ रही है।महिला निवेशकों की भागीदारी के मामले में असम सबसे पीछे है। पिछले तीन वर्षों में राज्य में महिला निवेशकों की संख्या में 1.9% की गिरावट आई है। कुछ राज्यों को छोड़कर, FY25 में महिलाओं की भागीदारी FY22 के मुकाबले राष्ट्रीय औसत से ज्यादा बढ़ी है। हालांकि अलग-अलग राज्यों में स्थिति अलग है, लेकिन कुल मिलाकर पूरे देश में वित्तीय बाजारों में महिलाओं की भागीदारी में सुधार हो रहा है।भारत के वित्तीय बाजारों में इस सकारात्मक बदलाव ने महिलाओं को आत्मनिर्भरता की ओर प्रेरित करते हुए आर्थिक विकास में उनकी भागीदारी को मजबूत किया है।
शिक्षित महिला समाज में अपनी स्थिति को समझती है और अपने कर्तव्य व अधिकारों का पालन करती है। इसके अलावा, महिलाओं की शिक्षा स्तर के बढ़ने से राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय महिलाओं का योगदान बढ़ रहा है। शिक्षा के माध्यम से महिलाएं अपनी सोच को बदल रही हैं, और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो रहा है। वे अब न केवल अपने परिवारों को आर्थिक रुप से सशक्त बना रही हैं, बल्कि समाज में भी अपनी पहचान बना रही हैं।
भारत में महिलाओं का औद्योगिक क्षेत्र में योगदान भी तेजी से बढ़ रहा है। उन्हें अब सिर्फ घरेलू कामों तक ही सीमित नहीं रखा जा रहा है बल्कि वे नए क्षेत्रों में भी अपनी योग्यता का प्रदर्शन कर रही हैं। सरकार भी विविध योजनाओं और नीतियों के माध्यम से महिलाओं के उद्योग व स्वरोजगार को प्रोत्साहित कर रही है। इससे न केवल महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है, बल्कि समाज में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका हो रही हैं। महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण के माध्यम से वे राष्ट्रीय विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
महिलाओं की राजनीतिक क्षेत्र में भागीदारी बढ़ती जा रही है। महिलाएं न केवल वोट के अधिकार का उपयोग कर रही हैं बल्कि वे स्वयं भी राजनीतिक निर्णयों में सम्मिलित हो रही हैं। राजनीति के गलियारों से होते हुए वे उच्च पदों पर आसीन हो रही हैं। महिलाओं की स्वास्थ्य सेवाओं में सक्रिय भागीदारी भी राष्ट्रीय विकास के लिए महत्वपूर्ण है। समाज में नारी की स्थिति में सुधार, उनके शैक्षिक और आर्थिक स्वतंत्रता में वृद्धि और उनके समाज में सक्रिय होने की भावना के साथ, उनका भविष्य और भी उज्जवल है। अब महिलाएं उस समय की ओर बढ़ रही हैं, जब उन्हें समाज में सम्मान मिल रहा है और उन्हें अपने सपनों को पूरा करने का अधिकार व अवसर मिल रहा है। भारतीय समाज में महिलाओं का यह नया युग, विकसित भारत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा।
देश की महिला विकास के साथ ही समृद्धि, समानता और न्याय की दिशा में हमें अग्रसर करती हैं। महिलाओं को समाज में सम्मान, स्वतंत्रता और सामानता के साथ अधिक शक्ति देना हमारे राष्ट्र की प्रगति और समृद्धि के लिए आवश्यक है। इसी आवश्यकता को समझकर मोदी सरकार ने सामाजिक और आर्थिक विकास को समर्थन करने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। इन योजनाओं में से कुछ महत्वपूर्ण योजनाएं हैं जो महिलाओं के उत्थान और समृद्धि को प्रोत्साहित करने का कार्य कर रही हैं। महिला उत्थान योजना महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देती है। महिलाओं को उनकी उत्पादक क्षमता को बढ़ाने के लिए विविध योजनाओं का लाभ मिलता है। यह योजना महिलाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए विविध कौशलों का प्रशिक्षण प्रदान करती है। स्किल इंडिया योजना भारतीय महिलाओं को विभिन्न क्षेत्रों में प्रशिक्षण प्रदान करती है ताकि वे स्वयं को समृद्ध कर सकें और आर्थिक रूप से स्वावलंबी बन सकें। स्वच्छ भारत मिशन महिलाओं को स्वच्छता के महत्व को समझाने और समुदाय में स्वच्छता की उत्तम प्रथाओं को बढ़ावा देती है। इसके माध्यम से महिलाओं को समाज में सम्मान और स्थान मिलता है, जो उनके उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान देता है। ये योजनाएं महिलाओं को स्वावलंबी बनाने और उन्हें समाज में उनकी सही जगह दिलाने में मदद कर रही हैं। स्वतंत्रता के बाद भारतीय महिलाओं ने रूढ़ियों को तोड़कर राजनीति, सामाजिक कार्य, कानून प्रवर्तन, बैंकिंग और अंतरिक्ष अन्वेषण जैसे विविध क्षेत्रों में राष्ट्र निर्माण में उल्लेखनीय योगदान दिया है। दृढ़ संकल्प और समर्पण ने देश को प्रगति और विकास की ओर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। समान शिक्षा, उचित अवसर और सुरक्षित वातावरण में भारत की नारी अपनी प्रतिभा का परचम लहराएगी और निश्चित रुप से विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में अपना सक्रिय योगदान देंगी।
1. छोटे शहरों की महिलाओं का बड़ा योगदान
छोटे शहरों की महिलाओं का भारतीय निवेश में महत्वपूर्ण योगदान है। वे न केवल एक बड़े कार्यबल का हिस्सा हैं, बल्कि छोटे और मध्यम उद्यमों (MSME) में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. विशेष रूप से, टियर 2 और टियर 3 शहरों में महिला स्वामित्व वाले उद्यमों की संख्या और निवेश में वृद्धि देखी जा रही है.
छोटे शहरों की महिलाओं का भारतीय निवेश में योगदान:
- MSME में भागीदारी:उद्यम पोर्टल में पंजीकृत महिला स्वामित्व वाले MSME, कुल MSME का 18.73% हैं और कुल निवेश में 11.15% का योगदान करते हैं।
- रोजगार सृजन:महिला स्वामित्व वाले MSME कुल रोजगारों में 10.22% का योगदान करते हैं।
- निवेश में वृद्धि:छोटे शहरों (B30) में महिला निवेशकों की संपत्ति प्रबंधन (AUM) में हिस्सेदारी 2019 में 20.1% से बढ़कर 2024 में 25.2% हो गई है।
- स्टार्टअप्स में भागीदारी:टियर 2 और टियर 3 शहरों से 45% स्टार्टअप्स शुरू हो रहे हैं, जो क्षेत्रीय उद्यमशीलता विकास में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है।
- सरकारी नीतियां:सरकार ने महिला उद्यमियों को समर्थन देने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं, जैसे कि मुद्रा योजना और स्टैंड-अप इंडिया योजना, जो महिलाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं.
- सामाजिक प्रभाव:महिला उद्यमियों और व्यवसायों में निवेश करने से सामाजिक प्रभाव को बढ़ावा मिलता है, जो समावेशी विकास को गति देता है.
छोटे शहरों की महिलाओं का निवेश में बढ़ता योगदान भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत है, जो क्षेत्रीय विकास और महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देता है.
2. डिजिटल टेक्नोलॉजी और निवेश की आसान भाषा से हुआ फायदा
डिजिटल तकनीक ने महिलाओं के लिए निवेश को कई तरीकों से आसान बनाया है। विशेष रूप से, डिजिटल प्लेटफॉर्म और वित्तीय साक्षरता कार्यक्रमों ने महिलाओं को निवेश के अवसरों तक पहुंच प्रदान की है, जिससे वे अपने वित्तीय भविष्य को नियंत्रित कर सकती हैं। सरलीकृत केवाईसी प्रक्रियाएं, कम लेनदेन लागत, और महिला-केंद्रित डिजिटल बैंकिंग उत्पादों ने भी निवेश को अधिक सुलभ बनाया है।
डिजिटल तकनीक ने महिलाओं के लिए निवेश को कैसे आसान बनाया है.?
वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम:
कई संगठन महिलाओं को वित्तीय साक्षरता प्रदान करने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग कर रहे हैं। ये कार्यक्रम महिलाओं को निवेश, बजट, और वित्तीय योजना बनाने के बारे में शिक्षित करते हैं, जिससे वे आत्मविश्वास के साथ निवेश कर सकती हैं।
डिजिटल प्लेटफॉर्म:
ऑनलाइन ब्रोकरेज, मोबाइल बैंकिंग ऐप्स, और वित्तीय शिक्षा वेबसाइटों ने महिलाओं के लिए निवेश करना पहले से कहीं ज्यादा आसान बना दिया है। वे अब घर बैठे ही विभिन्न निवेश विकल्पों का पता लगा सकती हैं, पोर्टफोलियो बना सकती हैं, और लेनदेन कर सकती हैं।

SIP महिलाओं की पहली पसंद
महिलाओं द्वारा SIP (सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) में निवेश पुरुषों की तुलना में 22% अधिक है, एक रिपोर्ट के अनुसार. इसके अलावा, महिलाएं एकमुश्त निवेश में भी 45% अधिक निवेश करती हैं, Business Standard के अनुसार. महिला निवेशकों द्वारा खोले गए SIP खातों में पिछले चार वर्षों में 269.8% की वृद्धि देखी गई है, Financial Express के अनुसार।
विस्तार में:
- महिलाओं में सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान के प्रति रूझान तेजी से बढ़ रहा है।
- SIP का बढ़ता महत्व:महिलाएँ निवेश के लिए SIP को प्राथमिकता दे रही हैं, और यह उनके निवेश पोर्टफोलियो का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
- जल्दी शुरुआत: कई रिपोर्ट में बताया गया है कि महिलाएँ अक्सर 20 से 30 वर्ष की आयु में ही निवेश शुरू कर देती हैं।
- वित्तीय स्वतंत्रता:यह प्रवृत्ति महिलाओं को वित्तीय रूप से स्वतंत्र और सशक्त बनाने में मदद करती है
- विविधता:महिलाएँ न केवल SIP में निवेश कर रही हैं, बल्कि वे अपने पोर्टफोलियो को विविध भी कर रही हैं, विभिन्न प्रकार के फंडों में निवेश कर रही हैं।
निवेश में पुरुषों से अधिक धैर्य
यह कहना मुश्किल है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में निवेश में अधिक धैर्यवान होती हैं, क्योंकि यह व्यक्तिगत प्राथमिकताओं और अनुभव पर निर्भर करता है। हालांकि यह है स्पष्ट है कि महिलाएं अपने निवेश में अधिक सतर्क, सजग, सहनशील और धैर्यवान होती। हालांकि, कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि महिलाएं निवेश करते समय अधिक सतर्क और जोखिम से बचने वाली होती हैं, जो उन्हें अधिक संतुलित पोर्टफोलियो बनाने और दीर्घकालिक लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद कर सकती है.
निवेश में महिलाओं के धैर्य को प्रभावित करने वाले कारक:
- जोखिम सहनशीलता:महिलाएं पुरुषों की तुलना में कम जोखिम लेने वाली हो सकती हैं, जिसका अर्थ है कि वे निवेश में अधिक धैर्य रख सकती हैं और अल्पकालिक उतार-चढ़ाव से विचलित नहीं होती हैं.
- वित्तीय साक्षरता:वित्तीय साक्षरता का स्तर भी धैर्य को प्रभावित कर सकता है। अधिक जानकार महिलाएं शायद निवेश के बारे में अधिक आश्वस्त होंगी और धैर्य रखने की अधिक संभावना होगी.
- दीर्घकालिक दृष्टिकोण:महिलाएं अक्सर दीर्घकालिक वित्तीय लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करती हैं, जो उन्हें अल्पकालिक नुकसानों से विचलित होने से रोक सकती है.
- सामाजिक और सांस्कृतिक कारक:सामाजिक और सांस्कृतिक कारक भी महिलाओं के निवेश के प्रति दृष्टिकोण को प्रभावित कर सकते हैं.
- हालांकि, कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि महिलाएं अधिक सतर्क, जोखिम से बचने वाली और दीर्घकालिक दृष्टिकोण वाली होती हैं, जो उन्हें अधिक धैर्य रखने में मदद कर सकती है।



