ᴛᴜᴅᴀᴡᴀʟɪ, ᴋᴀʀᴀᴜʟɪ, ʀᴀᴊᴀꜱᴛʜᴀɴ, 321610
प्राचीन समय से अब तक सोना खरीदने के पीछे आम धारणा यह रही है कि एक तो घर में जेवर बन जाएगा साथ ही बुरे वक्त पर उसे बेचकर कुछ पैसा मिल जाएगा।
साथ ही साथ भविष्य में जब बच्चों की शादी होगी तो हमें जेवर कम बनवाना पड़ेगा, क्योंकि बच्चों की शादी के वक्त तक यह बहुत महंगा हो जाएगा। प्राचीन काल से लेकर आज तक हम सोने के रूप में एक तरह से पैसों की बचत करते हैं। और किसी भी तरीके से अगर पैसों की बचत हो रही है तो यह गलत नहीं है खासकर गोल्ड में निवेश कई तरह के लाभ पहुंचाने में भी मदद करता है इसलिए इसे बेहतर तरीका माना जाता है।
जैसे सोने के माध्यम से हम महंगाई से भी मुकाबला कर सकते हैं। क्योंकि सोना मुद्रा स्पीति के प्रभाव को काम करता है जब महंगाई बढ़ती है तो ई की कीमत घटती है कुछ सालों से सोने का वार्षिक लाभ मुद्रा स्पीति की तुलना में ज्यादा रहा है बहुत बार शेरों में गिरावट के समय सोने की कीमतों में इजाफा होता है। दूसरी ओर यह परिवार की आर्थिक संकट में काम आता है आर्थिक संकट में परिवार सोनी को गिरवी रखते हैं या बेचते हैं और इसके माध्यम से अपनी जरूरत के मुताबिक मुद्रा प्राप्त कर लेते हैं इसी तरह के डिजिटल खतरे कम होते हैं क्योंकि इस हक नहीं किया जा सकता इसे कभी भी बचा और खरीदा जा सकता है यही कारण है कि लोग सोने को अपने बुरे वक्त का साथी मानते हैं और सोने को आमतौर पर ज्वेलरी के रूप में सहित कर रखते हैं। जनमानस की इसी धारणा का लाभ उठाकर आज के दौर में बाजार कई तरह के विकल्प मुखिया करने लगे हैं इन्हीं में से आजकल ज्वेलरी की गोल्ड स्कीम काफी चर्चा में है इसमें टुकड़ों में निवेश कर आप जेवर खरीद सकते हैं पहली नजर में यह स्कीम आकर्षक लगती है लेकिन उनकी कुछ सीमाएं हैं जिनका ध्यान रखना जरूरी है।
गोल्ड स्कीम
गोल्ड सेविंग स्कीम का समय 10 से 12 महीना का होता है कुछ इसकी में 18 महीना तक की भी होती हैं इसमें स्कीम की अवधि के अनुसार निवेदक हर मां ज्वेलर्स को एक निश्चित रकम अदा करता है अवधि की समाप्ति पर एक या दो किसने खुद ज्वैलर मिलता है या पहली किस्त पर भारी डिस्काउंट देता है
क्या लाभ मिलता है..क्या लाभ मिलता है…?
गोल्ड सेविंग स्कीम पर एक तरह से बैंकों में रिंग डिपॉजिट की तरह ही है। रिकरिंग डिपॉजिट फिक्स डिपाजिट की तरह सुरक्षित होती है इसमें निवेशक को हर महीने एक निश्चित अवधि तक कुछ पैसे जमा करवाने होते हैं जब यह स्कीम में मैच्योर हो जाती है तो निवेशकों को उसकी जमा पूंजी ब्याज समेत मिल जाती है रैकिंग डिपॉजिट छोटे समय के लिए भी करवाई जा सकती है और इस पर इंटरेस्ट रेट सेविंग से ज्यादा मिलता है। रिकरिंग डिपॉजिट और गोल्ड सेविंग स्कीम में फर्क सिर्फ इतना ही है की स्कीम की अवधि पूरी होने तक निवेदक को सोना ही खरीदना पड़ता है इस स्कीम में निवेशक को रिटर्न 6 से 8 फ़ीसदी के करीब मिलता है यह कंपनी कानून के अंतर्गत बदलाव की वजह से अब डिस्काउंट की तरह दिया जाता है।
गोल्ड सेविंग स्कीम की सीमा
गोल्ड सेविंग स्कीम अधिक लाभप्रद नहीं है क्योंकि इस तरह की योजनाओं के साथ कुछ सीमाएं निर्धारित रहती हैं जैसे कि निवेशक को सोना ही खरीदना पड़ता है, इस स्कीम में सोने के बिस्किट या सिक्के नहीं खरीद सकते केवल ज्वेलरी ही खरीदने की पाबंदी होती है ज्वेलरी के साथ और लागत भी जुड़ी रहती हैं जिसमें मेकिंग चार्ज का भी एक बड़ा हिस्सा होता है जो काम के अनुसार 15 से 30% तक होता है। यद्यपि ज्वेलर्स डिस्काउंट देते हैं लेकिन मेकिंग चार्ज इतना ज्यादा होता है कि यह रिटर्न को खत्म कर देता है सबसे बड़ी परेशानी सोने की कीमत से जुड़ी होती है ऐसी स्कीम के तहत निवेशक सोने चाहे जितना भी खरीदे लेकिन भाव वही लगेगा जो ज्वैलरी खरीदने की तारीख में होगा इसमें निवेदक तभी फायदे में होगा जब सोने की कीमत कम हो। गोल्ड सेविंग स्कीम में निवेश तभी करना चाहिए जब आपको एक साल के अंदर ही जेवर खरीदने हो और आपके पास एक मस्त बड़ी रकम अदा करने की स्थिति में हो कुछ ज्वेलर्स शिप जैसे विकल्प भी रखते हैं जहां आप मैच्योरिटी के बजाय हर महीने मौजूद भाव पर सोना खरीद सकते हैं लेकिन जब आप इस सोने के जेवर बनवेट हैं तो मेकिंग चार्ज भी जुड़ जाता है इस तरह की गोल्ड सेविंग स्कीम में आंख बंद करके पैसे लगाना फायदेमंद नहीं है क्योंकि यह नुकसान भी दे सकता है। आप अपनी पूंजी बैंक में जमा करके एक बड़ी रकम इकट्ठी होने पर मनचाहे ढंग से सोना खरीदें और गोल्ड सेविंग स्कीम के झांसी से बच्चे



