आर्थिक नीति – रेपो रेट में भारी कमी (50%), होम लोन और कार लोन होंगे सस्ते। विकास को मिलेगी गति।

<script async src=”https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9651446091912872″ crossorigin=”anonymous”></script>

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शुक्रवार को अर्थव्यवस्था में वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए रेपो रेट में 50 आधार अंकों की बड़ी कटौती करके इसे 6% से 5.5% करने की घोषणा की है। 1 साल में लगातार तीसरी बार रेपो रेट में कटौती की गई है। रिजर्व बैंक की इस कदम से प्लाटिंग रेट पर कर्ज लेने वालों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। इस फैसले से एक करोड रुपए की लोन पर हर महा ब्याज के रूप में 3283 रुपए और सालाना 39396 की बचत होगी। दोस्तों रिजर्व बैंक द्वारा लिया गया यह एक ऐतिहासिक निर्णय है और आर्थिक जगत मैं इसके बड़े परिणाम देखने को मिल सकते हैं। इसीलिए आर्थिक फंडा ब्लॉग, arthikfunda.com कि आज के आर्टिकल में रिजर्व बैंक के इस बड़े आर्थिक फैसले की पूरी विवेचना करेंगे। और सबसे बड़ी बात यह समझने का प्रयास करेंगे कि आखिर आरबीआई के इस बड़े आर्थिक फैसले का देश के विभिन्न सेक्टरों पर क्या असर पड़ेगा..? इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए आज की पोस्टों को में कई भागों में विभाजित कर रहा हूं। ताकि यह आसानी से आपको समझ में आ सके। आज की इस आर्टिकल को हम निम्न बिंदुओं के तहत रीढ़ करेंगे —

आज के आर्टिकल में ( टेबल ऑफ़ कंटेंट )

  1. भूमिका।
  2. विकास दर 6.5% रहने का अनुमान।
  3. ब्याज दरों में डबल कटौती।
  4. सेंसेक्स में 747 अंक का उछाल।
  5. यह चार बातें आपकी जेब पर पूरा असर डालेंगी।
  6. किफायती घरों की बिक्री बढ़ेगी।
  7. लग्जरी घरों की बिक्री पीक पर।
  8. गोल्ड लोन शेयर चमके।
  9. 100000 के सोने पर 85000 का लोन मिलेगा।
  10. कंपनियों में तेजी।
  11. आरबीआई का फोकस जीडीपी बढ़ोतरी
  12. शेयर मार्केट के वह 5 सेक्टर जिन्हें सबसे ज्यादा लाभ होगा – – -रियल स्टेट – बैंकिंग – ऑटो सेक्टर -एफएमसी जी सेक्टर – -आईटी सेक्टर
  13. आगे क्या उम्मीद।
  14. क्या राय है एक्सपर्ट की।
  15. निष्कर्ष।
  16. संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

आरबीआई के गवर्नर ने सीआरआर मैं 100 आधार अंकों की कटौती की भी घोषणा की जो 6 सितंबर 4 अक्टूबर 1 नवंबर और 29 नवंबर से 25 आधार अंकों की चार बराबर किस्तों में प्रभावी होगी। जनसंख्यकि, डिजिटलीकारण और घरेलू मांग के दम पर भारतीय अर्थव्यवस्था निवेशकों के लिए अपार अवसर प्रदान कर रही है। रिजर्व बैंक की इस घोषणा का शेयर बाजार ने स्वागत किया है और सेंसेक्स में बड़ा उछाल देखा गया है। केंद्रीय बैंक के इस कदम से बैंकिंग सिस्टम में 2.5 लाख करोड रुपए आने की उम्मीद है। जिससे लिक्विडिटी बढ़ेगी और क्रेडिट फ्लो को सपोर्ट मिलेगा। काम नीति का डर से बैंक रेनू पर ब्याज दर में कमी आती है जिससे उपभोक्ताओं के साथ-साथ व्यवसायों के लिए भी उधार लेना आसान हो जाता है। जिसके परिणाम स्वरुप अर्थव्यवस्था में अधिक खपत एवं निवेश होता है और उच्च विकास सुनिश्चित होता है हालांकि कटौती का असर इस पर निर्भर करेगा कि बैंक किस हद तक ब्याज काम करता है।

विकास दर 6.5% रहने का अनुमान :

वित्त वर्ष 2026 के लिए जीडीपी विकास दर अनुमान को 6.5% पर स्थिर रखा गया है। केंद्रीय बैंक के मुताबिक जीडीपी विकास दर वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही में 6 पॉइंट 5% दूसरी तिमाही में 6.7 प्रतिशत तीसरी तिमाही में 6. 6% और चौथी तिमाही में 6.3% रह सकती है। आरबीआई के गवर्नर ने कहा कि इस साल फरवरी से अब तक रायपुर दर में लगातार 100 आधार अंकों की कटौती की गई है और इसलिए मौद्रिक नीति रुक को “अकोमोडेटिव” से बदलकर “न्यूट्रल” कर दिया गया है। इससे आरबीआई समग्र विकास मुद्रा स्पीति गतिशीलता पर कड़ी नजर रख सकेगा। कीमतों में हुई व्यापक आधार पर नरमी के बीच मुद्रा स्थिति दर अब घटकर 3.2 प्रतिशत रह गई है। इसके साथ ही आरबीआई ने मुद्रा स्थिति डर के अपने अनुमान को भी 4% से घटकर 3.7% कर दिया है. वित्त वर्ष 2026 के लिए जीडीपी विकास दर इस अवसर पर 6.5%. पर स्थिर रखा गया है।

ब्याज दरों में डबल कटौती :

आरबीआई एमपीसी ने शुक्रवार को जहां रेपो रेट में उम्मीद से भी अधिक 0.5% की कटौतिकर इसे 6% से घटकर 5.5% कर दिया। आरबीआई ने मार्केट को सरप्राइज देते हुए क्रेडिट रिजर्व रेशों (CRR) वह भी 4% से घटकर 3% कर दिया। इससे बैंक सहित ब्याज दरों के प्रति संवेदनशील सभी स्टॉक में जबरदस्त तेजी देखने को मिली।

सेंसेक्स 747 अंक उछला :

आरबीआई द्वारा की गई इन बाहरी रेट कट से होम लोन डिमांड बढ़ने के साथ मकान की बिक्री बढ़ सकती है इससे बैंकिंग फाइनेंस कंपनियां के साथ रियल्टी स्टॉक 4% से अधिक उछाल गए वहीं लोन सस्ता होने से कर बाइक की बिक्री भी बढ़ाने की उम्मीद है। इससे ऑटो शेयर को भी बूस्ट मिलने की संभावना है।

ब्याज दरों में हुई इस डबल कटौती से निफ़्टी बैंक इंडेक्स अपने नए ऑल टाइम हाई ₹5695 के स्तर पहुंचने के बाद 1.47 प्रतिशत 56578 के स्तर पर बंद हुआ।

यह चार बातें आपकी जेब पर सीधा असर डालेंगी :

1. सीआरआर में 1% की कटौती यानी बैंक और छूट दे सकते हैं —

आरबीआई ने नगद आरक्षित अनुपात सीआरआर को 4% से घटकर 3% कर दिया है इससे बैंकों के पास 2.5 लाख करोड़ की अतिरिक्त नगदी एकत्रित होगी यह बैंक को होम लोन की ब्याज दरों को कम करने का विकल्प देता है।

2. रिटेल महंगाई आरबीआई के टायर से नीचे बनी रहेगी :

महंगाई आरबीआई के दायरे से नीचे आ चुकी है वित्त वर्ष 2025 26 के लिए रिटेल महंगाई 3.7% रहने का अनुमान है जो पहले 4% थी यह राहत खाद्य वस्तुओं की कीमतों में नमी अंतर्राष्ट्रीय कमोडिटी प्राइस में गिरावट की वजह से आई है।

3. न्यूट्रल यानी रेट कट का चक्र थम सकता है :

आरबीआई ने अब नीति रोक अकोमोडेशन से बदलकर न्यूट्रल कर दिया है केंद्रीय बैंक के मुताबिक अब नीति के पास सीमित स्पेस है इसलिए हर कदम सोच समझ कर उठना होगा यानी रेपो रेट में कटौती का चक्र तेजी से समाप्त होने वाला है।

4. वैश्विक स्थिरता के बीच हमारी बैलेंस शीट बेहद मजबूत :

दुनिया में पूंजी फ्लोर को लेकर उतार चढ़ाव हैं लेकिन भारत में उजली तस्वीर है। इसकी वजह है संतुलंत बैलेंस शीट कॉर्पोरेट घरेलू बैंक सरकार और विदेशी क्षेत्र इन सभी मोचन पर स्थिरता बनी हुई है और निवेश के लिए एक नया माहौल तैयार हो रहा है।

किफायती घरों की बिक्री तेजी से बढ़ेगी :

रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में एक मस्त जीरो पॉइंट पांच प्रतिशत की कटौती कर इंडस्ट्री से लेकर आम कर्ज दाताओं को चौंका दिया है। रियल्टी और ऑटो सेक्टर को इसका सबसे ज्यादा फायदा मिल सकता है खास तौर पर के फायदे और मिड रेंज वाले घरों और कारों की बिक्री को ट्रिगर मिल सकता है। कोविद-19 के बाद से देश भर में महानगरों से लेकर टियर 2 शहरों में अफॉर्डेबल मकान की बिक्री में सुस्ती देखी गई है। अनार के आंकड़ों से पता चलता है कि बड़े शहरों में के फायदे आवास की बिक्री का हिस्सा 2019 में 38% से गिरकर 2024 में 18% ही रह गया था। इस दौरान सप्लाई में भी हिस्सेदारी 40% से घटकर 16% रह गई। हालांकि बिना बिके स्टॉक में 19% की गिरावट देखी गई जो अफॉर्डेबल घरों की बिक्री की मांग का संकेत है।

रेपो रेट में यह है 0.5% की कटौती ऐसे वक्त हुई है जब 40 लाख से कम कीमत वाले घरों की बिक्री में मांग दिख रही है। बीते 1 साल में 7 बड़े शहरों में इस सेगमेंट में इन्वेंटरी 19% कम हुई है जो 2024 की पहली तिमाही में 1.40 लाख से घटकर 2025 की पहली तिमाही में 1 पॉइंट 13 लख यूनिट्स ही रह गई थी।

लग्जरी घरों की बिक्री पीक पर पहुंची :

कुल बिक्री में लग्जरी घरों का हिस्सा 2019 में 7% था जो 2024 में बढ़कर 26% हो गया। नई सप्लाई में हिस्सा 11% से दुगना होकर 26% हो गया लग्जरी घरों ( 1.5 करोड़ से अधिक) मैं बिना विकी स्टॉक में 24% की बढ़ोतरी हुई है यह 2024 की पहली तिमाही में 91,125 से बढ़कर 2025 की समान अवधि में 1.13 लाख हो गई।

गोल्ड लोन शेयर चमके :

इन घोषणाओं के साथ ही आरबीआई ने 2.5 लख रुपए से कम को गोल्ड लोन पर लोन टू वैल्यू एलटीवी रेशों को 75% से बढ़कर 85 कर दिया है इससे लोगों को अब गोल्ड की कुल कीमत के 85% के बराबर लोन मिलेगा इस फैसले से गोल्ड लोन कंपनियों के शेयर में पांच से 7% तक की बढ़ोतरी हुई है। रेट कट से बूस्ट के कारण शुक्रवार को सेंसेक्स 747 अंक यानी 0.92 प्रतिशत चढ़कर 82189 पर बंद हुआ निफ्टी भी 252 अंक यानी 1.0 2% से चढ़कर 25,0003 पर बंद हुआ।

एक लाख के सोने पर 85000 का लोन मिलेगा :

केंद्रीय बैंक ने गोल्ड लोन के नियमों में भी बदलाव किया है अब 2.5 लख रुपए तक के गोल्ड लोन पर लोन टू वैल्यू रेशों 75 प्रतिशत से बढ़कर 85% कर दिया है। अर्थात इसका मतलब होता है कि अब ₹100000 की गोल्ड वैल्यू पर 85000 तक का लोन मिल सकेगा पहले यह सीमा 75000 थी। 2.5 लख रुपए तक के छोटे गोल्ड लोन पर क्रेडिट अप्रेजल की जरूरत नहीं होगी यानी कागजी कार्रवाई कम होगी और लोन जल्दी मिलेगा। इससे छोटे कर्जदार खासकर ग्रामीण और छोटे शहर वाले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए लोन लेना आसान हो जाएगा

कम्पनी तेजी

1. मुथूट फाइनेंस – 6.98%

2. मण्णपुरम फाइनेंस – 5.64%

3. आईआईएफएल फाई – 5.20%

4. चोलामंडलम फाइनेंस – 5.25%

आरबीआई का फोकस जीडीपी बढ़ोतरी पर :

रेपो रेट में इस साल एक प्रतिशत तक कटौती कर इसे 5 पॉइंट 5% पर लाने के बाद आरबीआई ने अपने नीतिगत रुख को एक अकमोडेटीव से न्यूट्रल यानी तटस्थ कर दिया है। केंद्रीय बैंक का मानना है कि अब नीतिगत धर्म को लेकर सीमित स्पेस बचा है इसलिए हर कदम सोच समझकर उठाना होगा। इससे भविष्य में दरों में कटौती की गुंजाइश सीमित हो गई है अब नीतिगत फैसले डाटा पर आधारित होंगे अब दरें तभी घटेगा जब महंगाई बढ़ने की दर काफी कम रह जाएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि आरबीआई के फैसलों से ग्रामीण और शहरी इलाकों में खपत बढ़ने की उम्मीद है। इन्वेस्टमेंट फॉर्म फाइबर सिरका के फाउंडर अभय अग्रवाल ने कुछ समाचार पत्रों से खास बातचीत में बताया कि दरों में कटौती से खपत बढ़ेगी खपत बढ़ने से प्राइवेट कैंपेक्स बढ़ेगा कैंपेक्स बढ़ेगा तो रोजगार बढ़ेगा।

क्या कहना है एक्सपर्ट का :

1. वी.के. विजय कुमार, नियोजित फाइनेंस।

आरबीआई के फैसले इकोनामिक ग्रोथ को बढ़ावा देने वाले हैं पर रेट कट से बैंकों का मार्जिन कम होने की आशंका है इससे बैंक फाइनेंशियल स्टॉक दबाव में आ सकते हैं हालांकि ओवरऑल शेयर बाजार को आरबीआई के इस कदम से बूस्ट मिल सकता है।

2. डी. के. जोशी, मुख्य अर्थशास्त्री।

शेयर बाजार में सिर्फ रेपो रेट में कटौती से खास फायदा नहीं दिखता लेकिन सीआरआर में कटौती करते हुए आरबीआई ने लिक्विडिटी पुश किया है इन दोनों से इकोनॉमी को बहुत फायदा मिलेगा शहरी क्षेत्र में खपत बढ़ सकती है जिससे कंजमप्शन शेयरों में तेजी की उम्मीद है।

3. साक्षी गुप्ता, प्रिंसिपल इकोनॉमिस्ट एचडीएफसी बैंक

आरबीआई अब निकट भविष्य के लिए विराम ले सकता है सेंट्रल बैंक द्वारा डाटा निर्भर पर टर्न लेने की संभावना है और भविष्य में कोई भी डर कटौती केवल तभी हो सकती है जब विकास में भौतिक रूप से गिरावट आए।

महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर ( Q & A )

Question 1. रेपो रेट क्या होती है..?

उत्तर -पुनर्खरीद दर (पुनर्खरीद दर) वह ब्याज दर है जिस पर केंद्रीय बैंक वाणिज्यिक संस्थानों को धन उधार देता है जब धन की कमी होती है। सरल शब्दों में, यह वह दर है जिस पर बैंक कंसल्टेंसी के लिए सेंट्रल बैंक से धन उधार लिया जाता है, आमतौर पर सरकारी प्रतिभूतियों के बदले। यह तंत्र केंद्र को तरलता को विसर्जित करने और स्थिरता बनाए रखने की अनुमति देता है।

  • उधार लेने की प्रणाली: जब वाणिज्यिक बैंकों की कमी का सामना करना पड़ता है, तो वे पैसे उधार लेने के लिए केंद्रीय बैंक से संपर्क कर सकते हैं। बदले में, सेंट्रल ईस्ट बैंक स्थापित रेपो दर पर ये धन उपलब्ध कराता है।
  • संपार्श्विक के रूप में सरकारी स्वामित्व: ऋण लेने वाले बैंकों को संपार्श्विक के रूप में सरकारी स्वामित्व प्रदान करना चाहिए। ये प्रतिभूतियाँ केंद्रीय बैंक के लिए सुरक्षा जाल के रूप में कार्य करती हैं, यह सुनिश्चित करती हैं कि ऋण सुरक्षित है और भुगतान किया जाएगा।
  • पुनर्खरीद समझौता: “रेपो” शब्द पुनर्खरीद अभिनेता का रूप है। इस समझौते में यह निर्धारित किया गया है कि ऋण लेने वाले भविष्य के बैंक की किसी भी तारीख पर प्रतिभूतियों को पुनर्खरीद करना, आमतौर पर उच्च मूल्य पर, जिसमें रिपो दर पर गणना की गई ब्याज भी शामिल है।

Question 2. रेपो दर कैसे काम करती है.?

यह सुझाव देने के लिए कि रेपो दर कैसे संचालित होती है, इसकी तकनीक और इन टेक्नोलॉजी को शामिल करने की प्रक्रिया का पता लगाना आवश्यक है:

  • उधार लेने की शुरुआत: जब किसी वाणिज्यिक बैंक को धन की आवश्यकता होती है, तो वह केंद्रीय बैंक से संपर्क करता है, अपनी आवश्यकताएं और संपार्श्विक के रूप में सरकारी प्रतिभूतियां प्रदान करता है।
  • बैंक की भूमिका: केंद्रीय बैंक बैंक का आकलन करता है, संपार्श्विक को मंजूरी देता है, और असाधारण केंद्रीय रिज़र्व दर पर उपलब्ध कराता है।
  • ब्याज गणना: ब्याज दर (रेपो दर) ऋण ली गई राशि पर लागू होती है, और यह वाणिज्यिक बैंक के लिए ब्याज दर के रूप में अनिवार्य रूप से ऋण लेने की लागत है।
  • प्रतिभूतियों की पुनर्खरीद: स्वीकृत अवधि के बाद, ऋण लेने वाला बैंक सेंट्रल बैंक से प्रतिभूतियों को उस मूल्य पर पुनर्खरीद करता है जिसमें ऋण ली गई राशि और ब्याज शामिल होता है।

Question 3. रेपो दर का क्या महत्व है..?

रेपो दर इकोनोमिक जर्नल में काफी महत्वपूर्ण रचना है। यह एक ऐसा उपकरण है जिसका उपयोग केंद्रीय बैंक कई व्यापक आर्थिक बैंकों को प्राप्त करने के लिए करता है:

तरलता प्रबंधन: तरलता प्रबंधन प्रणाली में तरलता के प्रबंधन में भी महत्वपूर्ण है। इस दर को समाप्त करके, केंद्रीय बैंक बैंकों द्वारा उधार ली जाने वाली सलाहकार को नियंत्रित किया जा सकता है, 

निजीकरण नियंत्रण: स्वामित्व अधिकार का एक प्राथमिक उपयोग स्वामित्व है। जब बांड्ज़ अधिक होता है, तो सेंट्रल बैंक रेपो दर बढ़ाया जा सकता है। इससे ऋण लेना अधिक महंगा हो जाता है, जिससे उद्योग में मुद्रा आपूर्ति कम हो जाती है, जिससे प्रतिभूतियों को कम करने में मदद मिल सकती है।

आर्थिक प्रोत्साहन: इसके विपरीत, कम आर्थिक विकास की अवधि के दौरान, केंद्रीय बैंक राजकोषीय दर को कम कर सकता है। इससे ऋण लेना सस्ता हो जाता है, जिससे व्यवसाय और उपभोक्ताओं को ऋण मुक्ति के लिए छूट मिल जाती है, जिससे आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलता है।

Question 4. क्रेडिट रिजर्व रेशों (CRR ) क्या होता है..?

उत्तर – नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) के तहत, वाणिज्यिक बैंकों को केंद्रीय बैंक के पास रिजर्व के रूप में एक निश्चित न्यूनतम राशि जमा करनी होती है। बैंक की कुल जमाराशि के मुकाबले रिजर्व में रखी जाने वाली नकदी का प्रतिशत, नकद आरक्षित अनुपात कहलाता है। नकद आरक्षित राशि या तो बैंक की तिजोरी में जमा होती है या आरबीआई को भेजी जाती है।

बहुत महंगा पड़ने वाला है दुनिया को ट्रंप का “ट्रेड वार”

मुख्य नेविगेशन पर जाएंसामग्री पर जाएंफुटर छोड़ना

आर्थिक फंडा ब्लॉग — निवेश की दुनिया।

बहुत महंगा पड़ने वाला है दुनिया को ट्रंप का “ट्रेड वार” मजबूती के साथ रखनी होगी भारत को अपनी बात।

विश्व अर्थव्यवस्था

पोस्ट संपादित करे

सिंह साब

द्वारा Kedar लाल

पोस्ट किया गया 10/05/20251 टिप्पणियाँ

बहुत महंगा पड़ने वाला है दुनिया को ट्रंप का ट्रेड-वार। मजबूती के साथ रखनी होगी भारत को अपनी बात।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टेरीफ घोषणाओं के कारण ट्रेड वॉर की आशंकाओं के बीच सोमवार सुबह भारत सहित दुनिया भर के शेयर बाजार में भारी उतार-चढ़ाव दिखा। कई देशों के शेयर बाजार धडाम हो गए। यूरोप तथा एशिया के शेयर बाजार में काफी नुकसान हुआ है। एक तरह के आर्थिक युद्ध का माहौल दुनियाँ मे नज़र आने लगा है। आर्थिक फंडा (ब्लॉग ) कि आज की पोस्ट में हम इसी अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर चर्चा करने वाले है। आज किस आर्टिकल को हम निम्न बिंदुओं के तहत रीढ़ करेंगे।

टेबल ऑफ़ कंटेंट

  1. इंट्रोडक्शन। ट्रेड वॉर की शुरुआत।
  2. ट्रंप के ट्रेड वॉर के साइड इफेक्ट क्या होंगे।
  3. किस देश पर कितना टैरिफ
  4. मंदी की आहट शुरू
  5. एलपीजी गैस और पेट्रोल महंगा
  6. क्या कदम उठाने चाहिए भारत को।
  7. नया टैरिफ भारत के लिए चुनौती भी, तो अवसर भी।
  8. अगर दुनिया के देश एकजुट हुए तो अमेरिका को नुकसान संभव
  9. ट्रंप के टैरिफ वार के उद्देश्य क्या है।
  10. क्या कदम उठाएगा भारत
  11. निष्कर्ष।

क्या दुनिया के देश ट्रंप के टैरिफ युद्ध के विरुद्ध एकजुट होकर लड़ेंगे..? विश्लेषकों की दलील तो यही है कि ट्रंप की दोस्त के आगे झुकने के बजाय दुनिया को उनसे लड़ने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाना चाहिए। उनका मत है कि ट्रंप के दबाव में आना समस्या का समाधान नहीं है। पंप को तो यह देखना अच्छा ही लगेगा कि दुनिया के नेता उन्हें खुश करने के लिए उनके घुटनों पर गिरे। तब वह धमकाने के दूसरे दूसरे तरीके खोजने लगेंगे। लेकिन यह देखना वाकई शानदार होगा कि दुनिया के बाकी देश मिलकर जवाबी कार्रवाई करें अमेरिका के चारों ओर टैरिफ की दीवार बनाएं और दुनिया की इस महाशक्ति को वैश्विक रूप से बहिष्कृत कर दें इससे अमेरिका के बाहर वैश्विक कारोबार बढ़ेगा।

साथ यह उन तमाम राजनेताओं के लिए भी एक जरूरी सबक होगा जो विश्व व्यापार व्यवस्था को कुचलना की आशंका रखते हैं और जो अपने बेटू के सिद्धांतों को अमल में लाने के लिए दुनिया को मंदी में झाेकने से भी नहीं कतराते। यूं तो अमेरिका के बाहर की दुनिया बहुत बड़ी है लेकिन क्या यूरोप ट्रंप का मुकाबला करने के लिए एशियाई देशों के साथ हाथ मिला सकता है..? या यूरोप ट्रंप को सबक सिखाने के लिए अमेरिका के दो संकटग्रस्त पड़ोसियों मेक्सिको और कनाडा का साथ देगा..? या फिर यूरोपीय संघ के 27 अमीर देश आखिरकार अपनी नींद से जागेंगे और अमेरिका के साथ ट्रेड वॉर में शामिल होंगे..? लेकिन अफसोस की बात है कि ऐसा नहीं होने वाला हाल फिलहाल तो ऐसी संभावना नजर नहीं आती। पिछले हफ्ते ट्रंप द्वारा अपने आयात पर 20% टैरिफ की घोषणा करने के बाद आई यू ने सबसे पहले अमेरिका के खिलाफ जवाई अभी कार्रवाई करने के बजाय इस पर विचार किया कि चीन को यूरोप में अपना माल डंप करने से कैसे रोके। नतीजा तन ब्राज़ील ने चीनी टीवी पर 35% टैरिफ लगा दिया और वह दूसरे चीनी उत्पादों पर भी बहुत अधिक टैरिफ लगाने पर विचार कर रहा है। चीन पर ट्रंप के टैरिफ की बौछार ने यूरोप को भी चीनी माल पर टैरिफ लगाने के लिए प्रेरित किया है यानी ट्रंप का सामना करने के बजाय यूरोप में उलटे चीन के साथ ट्रेड बार छेड़ दिया है। जब बात अमेरिका की आती है तो यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के बीच जवाबी कार्रवाई के लिए आम सहमति नहीं बन पाती। फ्रांस जर्मनी स्पेन और बेल्जियम ए सी आई का उपयोग करने के पक्ष में हैं। लेकिन अन्य देश विशेष रूप से इटली रोमानिया ग्रीस और हंगरी इसके खिलाफ हैं। वे अमेरिका से बातचीत करना पसंद करते हैं। यूरोपीय संघ की नौकरशाही के भीतर नीति निर्माण की गति इतनी धीमी है कि अगर कोई आम सहमति बन जाती है तो भी यूरोपीय संघ ट्रंप के टैरिफ युद्ध का मुकाबला नहीं कर पाएगा। लेकिन कम से कम इस तरह की कार्रवाई ट्रंप को अपने तेरे फोन पर पुनर्विचार करने के लिए जरूर मजबूर कर सकती है। 2023 में यूरोपीय संघ और अमेरिका के बीच 818 अरब डॉलर का सर्विसेज ट्रेड था, जिसमें अमेरिका का ट्रेड सरप्लस 119 अरब डॉलर का था।

लेकिन एशियाई देशों के बारे में क्या..? परचेसिंग पावर के आधार पर दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। उसने अमेरिकी माल पर 35 परसेंट टैरिफ लगाकर जवाबी कार्रवाई की है लेकिन क्या एशियाई देश ट्रेड वॉर लड़ने के लिए चीन का साथ देंगे..? जापान दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया तो एशिया में चीन के प्रभाव को नियंत्रित रखने के लिए मिशन में अमेरिका के साझेदार रहे हैं। विक्रम को विश्व व्यापार व्यवस्था को नष्ट करने से रोकने के लिए चीन का साथ कैसे दे सकते हैं..? और क्या भारत चीन के सुरक्षा जोखिमों को नजरअंदाज करेगा। और क्या भारत चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए एशियाई देशों के साथ गठबंधन बनाएगा..? कई देशों ने चीन पर एंटी डंपिंग शुल्क लगाया है क्या वह इन मतभेदों को अलग रख पाएंगे और अमेरिका का सामना करने के लिए एक साथ आ पाएंगे।

ट्रम्प के टैरीफ वार के साइड इफेक्ट शुरू 

ट्रंप की टैरिफ से सोमवार को दुनिया भर के शेयर बाजारों में हड़कंप मच गया। दुनिया के शेयर बाजार में तीन से लेकर 13% तक की भारी गिरावट दर्ज की गई। अमेरिकी शेयर बाजार भी खुलते ही 4% तक लुढ़क गए। इसे लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का एक बयान सामने आया है उन्होंने कहा है कि–” कभी-कभी किसी चीज को ठीक करने के लिए दवा लेनी ही पड़ती है मार्केट में यह गिरावट सिर्फ मेडिसिन की तरह है जो लॉन्ग टर्म में फायदा पहुंचाएगी लेकिन फिलहाल निवेशकों को सिर्फ नुकसान ही दिख रहा है।” दरअसल ट्रंप के टैरिफ एक्शन के बाद अमेरिकी कंपनियों की मार्केट कैप करीब 6 लाख करोड डालर तक घट चुकी है रविवार को टर्म ने कहा था कि वह जानबूझकर शेयर बाजार में गिरावट नहीं ला रहे हैं उन्होंने मार्केट रिएक्शन का अंदाजा नहीं था और जब तक दूसरे देशों के साथ व्यापार घाटे का समाधान नहीं होता तब तक वह कोई डील नहीं करेंगे। उधर डॉलर के मुकाबले रुपए में 26 महीने की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है यह 60 पैसे कमजोर होकर 85 पॉइंट 84 प्रति डॉलर पर आ गया।

किस देश पर कितना टेरीफ —

भारत – 26%

चीन – 34%

वियतनाम – 54%

टाइवान – 34%

यूरोपीय यूनियन – 20%

दक्षिण कोरिया – 25%

जापान – 24%

दुनियाँ में मंदी कि आहट —

अमेरिकी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 0.3% रहने का अनुमान है। गोल्डमैन शेख के अनुसार 12 माह में यहां मंदिर की आशंका 35% से बढ़कर 45% हो गई है। मंडी की आशंका और मांग घटने की आशंकाओं से कमोडिटी की कीमतें घट रही हैं। कच्चा तेल 6.5% सोना 2.4% और चांदी में 7.3% की गिरावट दर्ज हुई है। कॉपर 6.5% जिंक 2% की गिरावट दर्ज करवा रहे हैं। अमेरिका में 10 साल के उस ट्रेजरी बॉन्ड का रिटर्न घट गया है अब अमेरिका में ब्याज दरें घट सकती हैं वहीं ट्रेड वॉर के दर से हमारे ऑटोमोबाइल आईटी मेंटल फार्मा और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में औसतन 7% की गिरावट दर्ज हुई है। शेयर मार्केट में सुनामी के बीच सोमवार को 24 कैरेट सोना 1929 रुपए गिरकर 890 85 रुपए प्रति 10 ग्राम पर आ गया 22 कैरेट सोना 1767 रुपए सस्ता होकर 81602 रुपए हो गया। चांदी प्रति किलो 2518 रुपए सस्ती होकर 90 392 रुपए हो गई।

एलपीजी सिलेंडर 50 रुपए महगा —

गैस सिलेंडर ₹50 महंगा हो गया है जयपुर में मंगलवार से 14 पॉइंट 2 किलो का घरेलू गैस सिलेंडर 808 रुपए की जगह 860 रुपए में बुक होगा। यह बढ़ोतरी प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के 10 करोड़ से ज्यादा लाभार्थियों पर भी लागू होगी। उन्हें अब यह 14 पॉइंट 2 किलो का सिलेंडर 508 रुपए की जगह 558 रुपए का पड़ेगा।

पेट्रोल -डीजल पर 2 रुपए का उत्पाद शुल्क बढ़ा —

पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी ₹2 प्रति लीटर बढ़ा दी गई है हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के चलते खुदरा कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। मतलब यह कि उपभोक्ताओं पर बड़ी हुई कीमतों का कोई असर नहीं पड़ेगा सरकार ने यह कदम सार्वजनिक तिल कंपनियों को हुए घाटे की भरपाई के लिए उठाया है। पेट्रोल पर अब कल केंद्रीय टैक्स 21.9 रुपए और डीजल पर 17.8 रुपए प्रति लीटर हो गया है।

मजबूती के साथ रखनी होगी भारत को अपनी बात

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी पारंपरिक टैरिफ आयात शुल्क योजना की घोषणा कर दी है। यह पारंपरिक टैरिफ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में काफी अनिश्चित और उत्तल-पुथल पैदा कर सकता है। भारत के लिए 27% टैरिफ का यह भुज ऐसे समय पर आया है जब अमेरिका के साथ एक बहुत क्षेत्रीय द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर गहन वार्ता कर रहा है। यह उल्लेखनीय है कि फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान दोनों देशों ने संयुक्त रूप से इन वार्ताओं पर सहमति जताई थी ऐसे में सवाल यह है कि भारत इन वार्ताओं में पारस्परिक टैरिफ के संदर्भ में किस प्रकार का रूख अपनाएगा..?

भारत को केवल अमेरिका के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाने के लिए कोई रियायत नहीं देनी चाहिए पिछले दो महीना में अमेरिका को दी गई कई रियासतों से स्पष्ट है कि ऐसी एक तरफ छूट अमेरिका की मांगों को बढ़ाने की भूख को और बढ़ाएगी। बी टी ए वार्ता केवल पारस्परिक शुल्क हटाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। भारत को अमेरिका को दी जाने वाली हर रियायत के बदले अतिरिक्त बाजार पहुंच सुनिश्चित करनी चाहिए। कपड़ा परिधान और चमड़ा उद्योग जैसे श्रम प्रधान क्षेत्र में शुल्क क्रियाएं होते हैं हासिल करना भारत के लिए महत्वपूर्ण होगा। भारत की रियायतें इस शर्त पर होनी चाहिए कि अमेरिका भविष्य में पारस्परिक शुल्क जैसी उपाय नहीं करने का वचन दे। बता में ऐसा प्रावधान शामिल होना चाहिए कि यदि अमेरिका अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन नहीं करता है तो भारत भी अमेरिका के प्रति अपनी किसी भी प्रतिबद्धता को निभाने के लिए बाध्य नहीं होगा। भारत को बता का दायरा यथासंभव सीमित रखना चाहिए इसे केवल वास्तु व्यापार तक ही सीमित रखा जाए अन्यथा बौद्धिक संपदा अधिकार सरकारी खरीद डिजिटल जैसे मुद्दों वाले कई जटिल क्षेत्र में अमेरिका को रियायत देनी पड़ सकती है। विशेष रूप से पेटेंट के क्षेत्र में अमेरिका की लंबित मांगों पर सावधानी से आगे बढ़ना होगा क्योंकि इससे जेनेरिक दावों के बाजार में प्रवेश में बढ़ाएं उत्पन्न हो सकती हैं। इस क्षेत्र में अमेरिका की मांगों को स्वीकार करने से दावों की कीमतें लगातार बढ़ सकती हैं जिससे सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता एक सपना बंद कर रह जाएगी इससे जन औषधि केंद्र और आयुष्मान भारत जैसी प्रमुख पहलुओं को गंभीर धक्का लगा सकता है। हाल ही में संयुक्त राज्य व्यापार प्रतिनिधि द्वारा जारी 2025 की नेशनल ट्रेड एस्टीमेट रिपोर्ट में भारत की अत्यधिक कृषि सब्सिडी को लेकर चिंता जताई गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की बाजार मूल्य समर्थन योजना घरेलू खाद्य सुरक्षा से कहीं आगे जा चुकी है और इसे भारत को चावल का शीर्ष वैश्विक निर्यातक बना दिया है। ऐसे में आसन का है कि अमेरिका के कृषि व्यवसाय के दबाव में ट्रंप प्रशासन भारत की न्यूनतम समर्थन मूल्य योजना को खत्म करने की मांग कर सकता है। क्योंकि एसपी योजना खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है इसलिए भारत के लिए इस मांग को मनाना लगभग असंभव होगा अतः भारत को वार्ता में इस मुद्दे को शामिल करने का विरोध करना चाहिए।

क्योंकि भारत में करोड़ों लोगों की आजीविका कृषि पर निर्भर है इसलिए वार्ता में अनाज चिकन अधिकांश डेयरी उत्पाद ताजा फल और सब्जियां तथा सूखे मेवे जैसे कृषि उत्पादों को पारस्परिक शुल्क कटौती से बाहर रखा जाना चाहिए। भारत का अमेरिका के साथ कई अलग-अलग क्षेत्र में जुड़ाव है हालांकि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्र में जुड़ाव का प्रभाव किसी भी अन्य क्षेत्र के परिणाम की तुलना में अधिक व्यापक और अर्थव्यवस्थव्यापी प्रभाव डालने वाला हो सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि BTA वार्ताओं का परिणाम संतुलित हो साथ ही बाजार के घरेलू हितों की रक्षा और संवर्धन हो। अमेरिका के साथ अन्य क्षेत्रों में लाभ हासिल करने के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारत के हितों से समझौता नहीं किया जाना चाहिए। पारस्परिक आयात शुल्क विश्व व्यापार संगठन में अमेरिका की प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन करते हैं इसलिए यह अवैध हैं। भारत को वित्तीय वार्ता सहित विभिन्न मंचों पर अमेरिका को यह बात कहने में संकोच नहीं करना चाहिए कि वित्तीय वार्ता में इस बात पर बार-बार जोर देना चाहिए कि एक आर्थिक रूप से मजबूत और सशक्त भारत अमेरिका के हित में होगा। खासकर चीन के खिलाफ एक संतुलन के रूप में। ऐसा न्याय संगत और संतुलित द्विपक्षीय व्यापार समझौता जो भारत के किसानों और श्रमिकों को कमजोर न करें और ने ही सस्ती दावों तक पहुंच को प्रभावित करें भारत और अमेरिका दोनों के हित में होगा।

प्रभावित देश एकजुट हुए तो अमेरिका को नुकसान संभव

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यापारिक भागीदारों पर व्यापक टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी है उन्होंने 170 से अधिक देशों के लिए नई टैरिफ दलों की घोषणा की है। कंपनी भारत पर 27 प्रतिशत पारस्परिक टैरिफ लगाया है इस प्रकार चीन पर 34% वियतनाम पर 46% दक्षिण कोरिया पर 25% यूरोपीय संघ पर 20% और अन्य देशों को भी उच्च टैरिफ की व्यापार बढ़ाओ का सामना करना पड़ेगा।

वित्तीय वर्ष 2025 26 के बजट में भारत सरकार ने टेरिफ वार को भागते हुए कई वस्तुओं पर सीमा शुल्क में कटौती की थी। बजट के दौरान 6 फीस दी डिजिटल सर्विस टैक्स जो गूगल टैक्स के रूप में भी जाना जाता है को भी वापस लिया था। इन सब प्रयासों के बावजूद बी निशिता के बादल बने हुए हैं जनवरी के महीने से शेयर बाजार भी तारीफ बार की चपेट में आ गया है राष्ट्रपति ट्रंप के अप्रत्याशित निर्णय लेने की आदत के कारण एवं विश्वास और अस्तित्व की स्थिति बनी हुई है।

आयात एवं निर्यात कर लगाने के कई कारण होते हैं इनमें घरेलू उद्योगों को संरक्षण देना प्रमुख कारण है। उदाहरण के तौर पर भारत कई बार केमिकल स्टील सोलर पैनल आदि की डंपिंग को रोकने के लिए भारी आयात शुल्क लगता है। कई बार राष्ट्रीय सुरक्षा पर्यावरण की रक्षा और हानिकारक वस्तुओं को रोकने के लिए भी अधिक शुल्क लगाया जाता है। देश की आर्थिक स्थिति प्रोडक्ट उत्पादन और टेक्नोलॉजी का स्तर अलग-अलग होने से आयात शुल्क में अंतर होना लाजमी है। अमेरिका के द्वारा आयात शुल्क बधाई जाने पर भारत के निर्यात पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा इस आसन का से इनकार नहीं किया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रभाव निर्यात के 10 से 12 फ़ीसदी तक हो सकता है जो लगभग 8 से 10 बिलियन डॉलर होगा। इस व्यापार व्यवधान के कारण भारत की अर्थव्यवस्था पर जो प्रभाव पड़ेगा वह जीडीपी का 0.1 फ़ीसदी से भी काम होगा यह प्रभाव भी कुछ समय तक ही रहने की संभावना है हालांकि भारत ने इस प्रभाव को कम करने के लिए ब्रिटेन ऑस्ट्रेलिया यूरोपीय यूनियन मिडल ईस्ट आदि देशों के साथ सक्रियता से व्यापार समझौते पर रणनीतिक रूप से काम करना शुरू कर दिया है। अमेरिका ने कई देशों पर उच्च टैरिफ लगाया है कई देशों पर यह भारत से भी अधिक है जिससे भारत को तुलनात्मक तौर पर हानि होने की संभावना खत्म सी हो जाती है बल्कि अनुकूल प्रतिस्पर्धा से फायदा भी हो सकता है। भारत के लिए तारीफ वार की परिस्थितियों आपदा में अवसर के सामान भी हो सकती हैं और वह परस्पर सहयोग से ट्रेड में अपनी भागीदारी बढ़ा सकता है। 2023 में वैश्विक माल निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 1.8 फ़ीसदी थी इसे बनाने का यह एक मौका है।

दूसरी ओर टैरिफ बार से अमेरिका और वैश्विक अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लग सकता है। अमेरिका फेडरल रिजर्व के पूर्वानुमानों के अनुसार इस वर्ष अमरी की अर्थव्यवस्था की सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 1.7 फ़ीसदी रहेगी जो दिसंबर के अनुमान 2.3 फिसदी से काफी कम है। आया तो शुल्क लगने से अमेरिका में आने वाला सामान महंगा हो जाएगा इस संबंध में फेड अध्यक्ष जेरोम पावेल का मानना है कि तेरे फुहार मुद्रा स्पीति के दृष्टिकोण से अमेरिका के लिए घातक होगा। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मौद्रिक अथवा वित्तीय नीति व्यापार युद्ध के विपरीत प्रभावों की भरपाई नहीं कर सकती। जेपी मॉर्गन के अनुसार हाल ही की व्यापार नीतियों के कारण अमेरिका में मंडी की संभावना 40 फ़ीसदी तक बढ़ गई है। वरिष्ठ अर्थशास्त्री केल्विन ने तो यहां तक कह दिया है कि टैरिफ के कारण आर्थिक मंदी के साथ-साथ मुद्रास्फीति और ढीले जो मार्केट के कारण अर्थव्यवस्था की विकास दर अगली 3 सालों में 0.32 फ़ीसदी तक जा सकती है।

अमेरिका का यह मानना है कि वह घरेलू खपत की आपूर्ति उत्पादन बढ़ाकर कर लेगा व्यावहारिक नहीं लगती। जानकारों का मानना है कि घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए कम से कम तीन से पांच वर्ष का समय चाहिए। यह बात उसे गहरे आर्थिक संकट में धकेल सकती है जो मुद्रा जनित आर्थिक मंदी का कारण हो सकती है। कुल मिलाकर अमेरिका का यह कदम उसकी अर्थव्यवस्था के लिए आत्मघाती भी साबित हो सकता है। दूसरा यह कि यदि अमेरिका भारत पर दबाव बनाने के उद्देश्य 27 विधि उच्च टैरिफ लगाना जारी रखता है तो व्यापार क्षेत्र में तनाव के रिश्तों का प्रशांत महासागर में रणनीतिक साझेदारी पर गहरा असर पड़ सकता है। और अंत में महत्वपूर्ण बात यह भी है कि सभी देश टैरिफ बार की चपेट में आने के कारण एक दूसरे से मिलकर काम करेंगे जिससे अमेरिका आर्थिक तौर पर अलग-अलग हो सकता है

इस चित्र का आल्ट गुण खाली है; इसका फ़ाइल नाम Screenshot_2025-03-29-12-50-55-536_com.google.android.googlequicksearchbox-1024x550.jpg है

नया टैरीफ भारत के लिए चुनौती भी, तो अवसर भी —

विश्व व्यापार संगठन के समझौता की धज्जियां उड़ाते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक तरफ रिसिप्रोकल टैरिफ की घोषणा कर विश्व व्यापार के क्षेत्र में हलचल पैदा करदी है। हालांकि 9 अप्रैल से लागू होने वाले इस टैरिफ को इन वक्त पर ट्रंप प्रशासन ने 90 दिन के लिए रोक दिया है। नई टैरिफ दारू की गणना और देश में चुनाव की त्रिकोण ने सभी अर्थशास्त्रियों और व्यापार विश्लेषकों को चौंका दिया है।

कहां जा रहा है कि अमेरिकी गणनाकारों ने प्रत्येक देश से अमेरिका का व्यापार घाटा लिया और उसे उस देश से हो रहे आयात से भाग देकर उसकी घाटा दर निकाली और उसे आधा कर उसकी टैरीफ दरक्योंकि प्रतिस्पर्धी चीन थाईलैंड वियतनाम इंडोनेशिया पाकिस्तान बांग्लादेश आदि की तारीफ करें भारत से बहुत अधिक हैं इसके अतिरिक्त विश्व की सप्लाई चैन में की घोषणा कर दी। दुनिया का कोई भी अर्थशास्त्री इस अजीब फार्मूले का समर्थन नहीं करेगा। आश्चर्य की बात है कि यदि व्यापार घाटा ही गणना का आधार है तो फिर आस्ट्रेलिया ब्रिटेन अरब देश और अर्जेंटीना जैसे देशों पर टैरिफ क्यों और कैसे लगाया है..? इन देशों से तो अमेरिका का व्यापार घाटे में नहीं है। कंजरवेटिव कानून वेदों के समूह ने इस न्यायालय में चुनौती दी है ट्रंप प्रशासन ने 60 व्यापार घाटे वाले देशों पर रैसिप्रोकल टैरिफ लगाया है। यह दर वर्तमान ड्यूटी सामान के अतिरिक्त है। बाकी सभी देशों पर 10% टैरिफ होगा। चीन पर 34% बांग्लादेश पर 37% पाकिस्तान पर 29% श्रीलंका पर 44% वियतनाम पर 46% थाईलैंड पर 36 प्रतिशत इंडोनेशिया पर 32% भारत पर 26% जापान पर 24% यूरोपीय देशों पर 20% और ब्रिटेन पर 10% टैरिफ लगाया गया है। भारत के संदर्भ में देखें तो चुनौतियां निश्चित रूप से हैं लेकिन जो परिस्थितियों को अवसर में और अवसरों को समृद्धि में बदलते हैं वही विजेता होते हैं। यदि भारत का अमेरिका को निर्यात 10% से भी प्रभावित होता है तो हमारी जीडीपी 0.2% काम हो सकती है किंतु अन्य देशों के निर्यात में कमी से भारत का व्यापार घटेगा नहीं अपितु बढ़ेगा। अमेरिका में टैरिफ के कारण कई ऐसी वस्तुएं जो अत्यावशक नहीं है उनका उपयोग कम हो जाएगा जैसे डेरी उत्पादन जावरा ऑटोमोबाइल मेटल आदि। भारत का निर्यात इन वस्तुओं में घटेगा। किंतु आवश्यक उपयोग की वस्तुएं जो सामान्यतः अमेरिका में काम उत्पादित होती हैं, या नहीं होती है जैसे –टेक्सटाइल,फार्मा,आईटी,चिप्स,मोबाइल फोन,मशीनरी खिलौने, इलेक्ट्रॉनिक्स कैपिटल, गुड्स,सोलर पैनल्स,सस्ती कारें, मिनरल फ्यूल,स्टोन ऑर्गेनिक,केमिकल्स आदि का निर्यात बढ़ सकता है। क्योंकि प्रतिस्पर्धी चीन थाईलैंड वियतनाम इंडोनेशिया पाकिस्तान बांग्लादेश आदि की तारीफ करें भारत से बहुत अधिक हैं इसके अतिरिक्त विश्व की सप्लाई चैन में बदलाव भी भारत के पक्ष में जाने की संभावना है। ट्रंप के टैरीफ वार के कई उद्देश्य दिखते हैं जैसे —

— अमेरिका को स्थानीय उद्योगों की मजबूती यानी मेक इन अमेरिका को बढ़ावा देना।

— स्थानीय उद्योगों के माध्यम से अमेरिका में नए रोजगार पैदा करना।

— अमेरिका के व्यापार घाटे को कम कर टैरिफ की आय से क्षतिपूर्ति करना।

— खर्चों में कटौती करना तथा बॉन्ड की दरों में कमी कर ब्याज के खर्चों में कटौती करना।

उल्लेखनीय है कि ट्रंप के आने के बाद बंद की यील्ड 4.79 प्रतिशत से गिरकर 4 पॉइंट 17 प्रतिशत हो गई यानी 0.62 प्रतिशत घटी है। अमेरिका पर 36.5 ट्रिलियन डॉलर अर्थात भारत की जीडीपी का 10 गुना का कर्ज है यानी 2.26 ट्रिलियन डॉलर की बचत है। कहां जा रहा है कि टैरिफ लगाने से अमेरिका में महंगाई बढ़ेगी रोजगार व विकास दर घटेगी शेयर बाजार में मंडी का असर आएगा और डॉलर गिरेगा यह प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है।

क्या कदम उठाने चाहिए भारत को —

भारत को दिन प्रतिदिन बदल रही परिस्थितियों को देखते हुए सोच समझकर कदम उठाने होंगे। इस ट्रेड वॉर में अभी कई मोड़ आएंगे। एट जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। और धैर्य रखना चाहिए किंतु सचेत सजग और तैयार रहना चाहिए। भारत के लिए आने वाले अवसरों को खोजा जाना चाहिए। इसके लिए कई कार्य योजनाओं पर अमल किया जा सकता है जैसे —

–अमेरिका के साथ चल रहे द्विपक्षीय व्यापार समझौते (बी टी ए ) पर तेजी से किंतु मजबूती के साथ आगे बढ़ा जाए, जो वस्तुओं तक ही सीमित रखा जाए जहां टेरेस सीधा समान स्तर पर अमेरिकी माल से इस स्प्रेधा करता है। शिव पेटेंट आईटी कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा तथा पिछड़े क्षेत्रीय विकास कार्यक्रमों को ईस्वीपक्षीय समझौते के दायरे से बाहर रखकर भारत के व्यापक हितों की रक्षा की जानी चाहिए।

जब अधिक तारीफ वाले देशों से उत्पादन भारत आने लगे तब एनएचसी निवेश के लिए व्यापक पॉलिसी सुधार आवश्यक होंगे जो विदेशी निवेश को आकर्षित करेंगे। मेक इन इंडिया को मजबूती देने के लिए सस्ता कच्चा माल उपलब्ध कराना वैल्यू चेक को मेक इन इंडिया के अनुकूल बनाना भी आवश्यक है। इसके लिए नियामक आयोग प्रस्तावित है। चीन जैसे देश जिन पर भारी तेरे फेवी अपना अतिरिक्त माल भारत में डंप कर सकते हैं। आते भारत को इस पर और 20 सतर्क रहकर ड्यूटी लगाने के लिए तैयार रहना होगा। भारत को आर्थिक रोजगार और औद्योगिक कानून को कानून को सुगम बनाकर औद्योगिक और व्यापार व्यवस्था मैं तत्काल सुधार की ओर बढ़ना होगा बड़े हुए टैरिफ के प्रभाव प्रक्रियाओं सुधारो और उठाए जाने वाले कदमों और प्रस्तावित करने तथा उन्हें त्वरित गति से लागू करने के लिए एक विशेषागों की टास्क फोर्स बनानी भी जरूरी है जो लघु व दीर्घकालिक योजना पर कार्य करें।

इस चित्र का आल्ट गुण खाली है; इसका फ़ाइल नाम IMG_20230908_134557-768x1024.jpg है

फोटो – kedar lal ( सिंह साब ) चीफ एडिटर “आर्थिक फंडा. कॉम “। arthikfunda.com

लेखक के बारे में–

मेरा नाम केदार लाल है, मुझे प्यार से सिंह साहब और K. S. Ligree के नाम सभी जाना जाता है। मैं राजस्थान राज्य के करौली जिले के अंतर्गत एक छोटे से गांव टुड़ावाली का रहने वाला हूं। मैंने राजस्थान विश्वविद्यालय और वर्धमान महावीर विश्वविद्यालय से बीए, एमए, बीएड, MBA, BJMC ( पत्रकारिता ) की शिक्षा प्राप्त की है। मैंने कई अखबारों तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कार्य किया है। मैंने कई वर्षों तक शिक्षक के तौर पर भी कार्य किया है। मैं कई वर्षों से ब्लॉगर और वर्ड प्रेस पर अपने आर्टिकल लिखता हूं। मुझे लिखने का बहुत शौक है।

मुझे घूमना, समाचार सुनना,अखबार पढ़ना,पत्रिकाएं पढ़ना, समाचार देखना, डिबेट कार्यक्रम देखना, अंतरराष्ट्रीय घटनाओं के बारे में जानकारियां प्राप्त करना, विश्व के करंट मुद्दों के बारे में पढ़ना, लॉन्ग ड्राइव पर जाना और पर्वतीय क्षेत्रों में घूमना बहुत पसंद है।

URL — arthikfunda.com

केदार लाल — चीफ एडिटर arthikfunda.com

ऊपर ले जाएनीचे की ओरटॉगल पैनल: SiteSEO

Social

Advanced

RedirectsFocus Keywords

ट्रंप का टैरिफ वार — अंतरराष्ट्रीय आर्थिक मुद्दे।×ट्रंप का टैरिफ वार×बहुत महंगा पढ़ने वाला है दुनियाँ को ट्रम्प का ट्रेड वार×अर्थव्यवस्था में होने वाले परिवर्तनों कि जानकारी×घरेलु बचत×इन्वेस्टमेंट×निवेश×फाइनेंस×इन्सुरेंस×लोन×बजट×शेयर मार्केट×विश्व अर्थव्यवस्था×आर्थिक विकाश कि जानकारी देने वाले बेहतरीन यूनिक और मौलिक आर्टिकलדपोस्ट संपादित करे”संपादित करें

सिंह साब

Kedar Lal

मेरा नाम केदार लाल है ( K. L. Ligree)। मैं भारत देश के अंतर्गत राजस्थान राज्य के करौली जिले के टुड़ावली गांव का रहने वाला हूँ। मैंने राजस्थान विश्वविधालय एवं वर्धमान महावीर विश्वविद्यालय कोटा से बीए, एमए, बीएड, एमबीए एवं बीजेएमसी (पत्रकारिता ) कि शिक्षा प्राप्त कि है। कुछ वर्षों तक मैं राजस्थान एवं देश की प्रतिष्ठित समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका एवं दैनिक भास्कर में विपणन ( Marketing ) कार्य भी किया एमबीए के बाद मैंने गोदरेज, टाटा AIG, आइडिया एवं वोडाफोन जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कार्य किया है। मैं करौली जिले के कई विद्यालयों और कोचिंग संस्थानों में काफी समय तक शिक्षण कार्य से जुड़ा रहा हूं। रुचियाँ — मुझे समाचार पत्र पढ़ने, न्यूज़ देखने, डिबेट देखने, घूमने का शोक है। मुझे पारिवारिक और मनोरंजक फिल्में देखने का भी काफी शौक है। मुझे घूमना और लॉन्ग ड्राइव पर जाना अच्छा लगता है। मैं पर्वतीय क्षेत्र में घूमने का शौकीन हूँ। मुझे पढ़ने और अपने ब्लॉग के लिए आर्टिकल लिखने का भी काफी शौक है। मेरे दो ब्लॉग है जिनके लिए मैं आर्टिकल लिखता हूं और मैं फुल टाइम कंटेंट क्रिएटर हूं। ब्लॉग — 1. प्रेरणा डायरी ( ब्लॉग ) prernadayari.com (blogger ) 2. आर्थिक फंडा (ब्लॉग ) arthikfunda.com ( wordpress ) मैं बचपन से ही लेखक, पत्रकार, और एक अच्छा शिक्षक बनना चाहता था।

पोस्ट नेविगेशन

पिछलाक्या है डीपसीक..? और कैसे डीपसीक सिखा दिया कि “इनोवेशन की फ्यूचर है।”

अगलाकर्ज के भरोसे कितनी ऊंची उड़ान भर सकेगा पाकिस्तान..?

1 टिप्पणी

  1. द्वारा Kedar Lalपोस्ट किया गया 05/06/2025प्रतिक्रियामैं अपने सभी पाठकों से अनुरोध करता हूं कि इस पोस्ट के बारे में अपनी प्रतिक्रिया जरुर व्यक्त करें। अगर कोई कमी दिखाई देती है तो हमें सुझाव दें। हम अपने ब्लॉग को यूनिक बनाने के लिए आपके सुझावों को प्राथमिकता देंगे।

प्रातिक्रिया दे

Kedar Lal के रूप में लॉग इन किया गया। अपनी प्रोफ़ाइल संपादित करेंलॉग आउट करें? आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

आपकी टिप्पणीआर्थिक फंडा.कॉम के लोकप्रिय पोस्टखोजें

Recent Posts

Recent Comments

  1. पोस्ट संपादित करे पर Kedar Lal
  2. आर्थिक प्रेरणा – रोशनी नाडर मल्होत्रा – आई टी कम्पनी कि पहली महिला मुखिया देश की सबसे अमीर और दुनिया की पांचवीं सबसे अमीर महिला बनी। पर Kedar Lal
  3. आर्थिक प्रेरणा – रोशनी नाडर मल्होत्रा – आई टी कम्पनी कि पहली महिला मुखिया देश की सबसे अमीर और दुनिया की पांचवीं सबसे अमीर महिला बनी। पर Kedar Lal
  4. Home पर Kedar Lal
  5. नौकरी के कितने दिन बाद शुरू करें निवेश..? पर Kedar Lal

Copyright © %%2025%% %%arthikfunda.com%%.

जारी है ट्रंप का ट्रेड वार.. स्टील अल्युमिनियम पर टैरीफ 50% तक बढ़ाया..!

दोस्तों नमस्कार। आर्थिक फंडा ब्लॉग में आप सभी पाठकों का स्वागत है। डोनाल्ड ट्रंप का यह दूसरा कार्यकाल है। उनके बारे में कहा जाता है कि डोनाल्ड एक व्यापारी है और वह जिस देश के साथ भी जाते हैं या अपने संबंध बनाते हैं तो सिर्फ व्यापारों को प्राथमिकता में रखते हैं। दूसरी तरफ यह भी माना जाता है कि डोनाल्ड टर्मफ मूड़ी इंसान हैं। वह कभी भी, अचानक, चौंकाने वाली फैसला ले लेते हैं। हाल ही में शुरू हुआ डोनाल्ड ट्रंप का टैरिफ बार अभी भी बदल तो जारी है। डोनाल्ड ट्रंप ने एक नया फैसला किया है और स्टील तथा एल्यूमिनियम पर टैरिफ 50% तक बढ़ा दिया है।

ट्रामफ़ का ट्रेड वार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्टील और एल्यूमीनियम के आयात पर तारीफ को 25% से दोगुना कर 50% तक कर दिया है यह बढ़ोतरी बुधवार से ही लागू हो गई है ट्रंप ने यह कदम घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बूस्ट देने की कोशिशें के तहत उठाया है मार्च के बाद से ही इस मेटल पर यह दूसरी तारीफ बढ़ोतरी है जो ऑटोमोबाइल से लेकर डिब्बा बंद सामान तक की इंडस्ट्री के इनपुट कॉस्ट को बढ़ा देगी

क्या असर होगा दुनिया पर

यह धातुएं निर्माण उद्योग से मुख्य रूप से जुड़ी हुई है इसीलिए इस फैसले का निर्माण क्षेत्र पर असर हो सकता है और यहां महंगाई देखी जा सकती है। यूरोप में इसका मिला-जुला असर होगा कुछ देशों को सस्ते आयात का फायदा मिलेगा क्योंकि अमेरिका में स्टील महंगी हो जाने से ग्लोबल स्टील का रोग यूरोप की ओर हो सकता है। हालांकि ब्रिटेन से स्टील और एल्यूमीनियम के आयात पर टैरिफ मौजूद 25% के स्तर पर ही रहेगा जिससे दोनों देशों को 9 जुलाई की समय सीमा तक नई लवी का कोटा अंतिम रूप से देने के लिए समय मिल जाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि स्टील और एल्यूमीनियम पर तेरे 50 फ़ीसदी करने से विदेशी उत्पादकों पर असर पड़ेगा

इसी अमेरिका की दूसरे व्यापारिक साझेदार भी जवाबी कदम उठा सकते हैं। चीन के साथ इस तरह का वाक्य हो भी चुका है अमेरिका का। इसे अमेरिका के निर्माता और उपभोक्ताओं पर भी लागत का बोझ बढ़ेगा वैश्विक व्यापार तनाव फिर से उभर रहा है। कंपनी प्रारंभ में दुनिया के अधिकतर देशों पर टैरिफ लगाया। उसके बाद कुछ क्षेत्रों में उन्होंने अचानक रिया यह देना शुरू कर दिया उसके बाद अब फिर से अचानक स्टील और एल्यूमीनियम पर अत्यधिक टैरिफ लगाकर अमेरिका ने एक बार फिर से ट्रेड वॉर को नया रूप दे दिया है।

किन देशों पर पड़ेगा अधिक असर

जर्मनी इटली स्वीडन और नीदरलैंड जैसे यूरोपीय देशों की स्टील कंपनियों को इस तरफ से बड़ा झटका लगेगा

कनाडा मैक्सिको ब्राजील और साउथ कोरिया जैसे देसी देश की स्टील निर्यातकों की लागत बढ़ेंगे

भारत पर भी होगा असर

यूरोप और चीन के मुकाबले भारत पर कम असर होगा क्योंकि देश से अमेरिका को कम स्टील का निर्यात होता है भारत ने 2024 25 में जो कि अभी का ताजा ताजा आंकड़ा है अमेरिका को गरीब पांच अरब डॉलर की स्टील और एल्यूमीनियम तथा इसे बने उत्पादों का निर्यात किया टैरिफ बढ़ने से भारतीय निर्यातकों को दो अरब डॉलर का नुकसान हो सकता है साथ ही चीन से डंपिंग बढ़ाने का भी खतरा है

ट्रंप के फैसले से यूरोपीय यूनियन भी नाराज

यूरोपीय यूनियन ट्रंप की इस नीति से बेहद नाराज है 27 यूरोपीय देशों के इस संगठन ने कहा है कि यह टैरिफ नीति चल रही ट्रेड डील बातचीत को नुकसान पहुंचती है यूरोपीय यूनियन ने प्रतिशोधनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी है जो 14 जुलाई से लागू की जा सकती है।